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वो देखता नहीं कि इधर देखता नहीं / कांतिमोहन 'सोज़'

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वो देखता नहीं कि इधर देखता नहीं ।
ईमान की तो ये है मुझे कुछ पता नहीं ।।

मैंने वफ़ा जो की तो निभाए चला गया
कैसे कहूँ कि इश्क़ में मेरी ख़ता नहीं ।

सुनते थे हम वफ़ा का सिला[1] है वफ़ा मगर
उसके यहाँ तो ऐसा कोई क़ायदा नहीं ।

वो संगे-दर[2] था उसका नज़र बारहा[3] गई
गो मुड़ के देखने से कोई फ़ायदा नहीं ।

पलकों से जिसके ख़ार चुने मैंने उम्र भर
वो रहगुज़र थे उसकी मेरा रास्ता नहीं ।

अपनों को दुःख है ग़म का मुदावा न कर सके
ग़ैरों को कोफ़्त है कि तमाशा हुआ नहीं ।

महफ़िल से उठ चला है ख़मोशी के साथ सोज़
क्या झूट बोलना कि अभी दिल भरा नहीं ।।

शब्दार्थ
  1. बदला
  2. चौखट का पत्थर
  3. बार-बार