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शकुन्तला / अध्याय 8 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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नृप चुपहिं चुप मधुर स्नेहक देखि चारु चरित्र।
कहल प्रेयसिसँ-‘अहा! की अछि दुलार पवित्र।।
विहग धरिकें शुद्ध स्नेहक की मनोहर ज्ञान।
केहन निर्भय करय करपर ‘गुटरुगुं’ केर गान।।’

अस्तु, प्रेमी-प्रमिकाक चरित्र के कर गान?
तकर-वर्णन करब थिक आकाश-पुष्प-समान।।
कार्य-कथनक तुल्यता भय सकय कोन प्रकार?
लेखनी असमर्थ से चित्रणक सुख-विस्तार।।

एक दिन मन पड़ल बिसरल राज-कार्यक ध्यान।
कयल तपवनसँ महीपति विवश भय प्रस्थान।।
निज प्रियासँ कहल जैखन नृप स्वकीय प्रयाण।
अहह! सुनितहिं, गेल उडि़ सन चन्द्रवदनिक प्राण।।

उनटि वक्षस्थल रहल छल क्षणहिं क्षण दुखपूर्ण।
सुमिरि भावी विरहसँ छल हृदय चूर्ण-विचूर्ण।।
चिहुँकि प्राणेशक हृदयमे लपटि से झट गेलि।
सुन्दरी लतिका लवंगक तुल्य शोभित भेलि।।

विवशता बुझि किन्तु दृढ़ प्रियतय-रता से बाल।
रोकि राखबसँ प्रियहिं असमर्थ भेलि विशाल।।
हारि से मृगलोचनी भरि बारिसँ निज नैन।
पकडि़ खूँट दुकूल बाजलि कातरा मधू बैन।।

‘पाणप्रिय! पुनि आब कहिआ?’ कण्ठ गद्गद भेल।
‘देब दर्शन’ शब्द दू मुख-भीतरहिं रहि गेल।।
किन्तु आधहुँ वाक्य सद्यः पंचबाणक तीर।
गेल गडि़ महिपाल-उर वैकल्यप्रद गम्भीर।।

किन्तु कोनहुँ भाँति हृदितल लेल भूप सम्हारि।
प्रियतमाकेर स्कन्धपर युग बाहु-वल्लि बिथारि।।
पोछि प्राणप्रियाक लोचन-नोर से दुष्मन्त।
कहल-‘प्राणप्रिये! अधीरा होइ जनि अत्यन्त।।’

स्नेह भरि वदनारविन्दक चुमति मधु-मकरन्द।
लैत तनिकर पाणि-पल्लव पाणिमे सानन्द।।
देल निज नामांकिता मणि-मुद्रिका पहिराय।
और मिलनावधि अपन एहि भांति देल बताय।।

‘हमर नामाक्षर प्रिये! अँह नित्य एकहिं-एक।
गनब, हो यदि कष्ट नहि तँ राखि निश्चल टेक।।
हैत जेहि दिन गण्य अन्तिम वर्ण हे करभोरु।
मिलन तकरे प्रात निस्सन्देह, चिन्ता छोड़।।

अस्तु, ईदृश सान्त्वना प्राणप्रियाकें दैत।
तनिक कातरतामयी छवि दृष्टि-सद्म घरैत।।
नृप बिदा लेलनि प्रियासँ भेटि करुणाधाम।
विह्वलाति शकुन्तला खसि चरण कयल प्रणाम।।

सखि-युगल तत्क्षण कहल क्रमसँ गिरा सुरसाल।
‘प्रेममूर्ति! सुविज्ञ करुणाधाम हे नरपाल!
भेल नहिं सत्कार से अपराध देब हटाय।
अधिक की! एहिना सखिक सुधि ततहुँ राखल जाय।।’

देल उत्तर तकर वसुधाधीश-‘कहलहुँ बेश!
सखिहुँ धरि सत्कारमे देलहुँ रहल की शेष।।
अँहक सखि-सम्बन्धमेकी कहु एखन विस्तारि।
हृदय जँ दो बिसरि, तैखन सकब ताहि बिसारि।।

अस्तु, सभसँ लय बिदा, निज विरह दैत अनन्त।
कयल रजधानीक दिसि प्रस्थान नृप दुष्यन्त।।
प्राणनाथक ध्यानमे अनवरत रहि तल्लीन।
छटपटाइत रहलि, जल बिनु यथा छटपट मीन।।