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शकुन्तला / प्राक्कथन / भाग 1 / दामोदर लालदास

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(क)

जखन छलहुँ हम छात्र मात्र दसमे श्रेणीमे।
किछु कविता करबाक लालसा उमड़ल जीमे।।
अंग्रेजी प्वेट्रीक पंक्ति लगलहूँ अनुवादय।
लगलहुँ मैथिलिएक पद्य हम क्लास सुनाबय।।
अध्यापकगणहुँक प्रसन्नता बेश विलोकल।
तें मन बढ़ितहि गेल क्षणहुँ रचना नहि रोकल ।।
वर्गाध्यापक तथा प्रधानो मुद अपारसँ।
कवि कवि कहि बतियाथि नित्य मधुमय दुलारसँ।।
मातामह कवि ‘लाल’क ‘सुन्दरकाण्ड’ छपल छल।
से कर पड़ितहिं नयन तृप्त, मानस-रस उछलल।।
से पियूषमय पद्य मधुर मन भरि हम पीलहूँ ।
कलाकारिता उमड़ि उठल, कविते लय जीलहुँ।।
लेखनि लागल चलय काव्य-पथमे अति झमकति।
राति-राति भरि कलम सुतय दै छलि नहि छमकति।।
ठमकति नहि छल क्षणहुँ, कहैछल क्षण-क्षण बमकति।
सरस ललितगर छन्द-सुमन रचु गम-गम गमकति।।
सुनल-भेल देहान्त पूज्य सर सिंह रमेशक।
मिथिला, मैथिलि, सनातनक गौरव मिथिलेशक।।
स्वर्ग-प्रयाणक सुमिरि दुसह घटना हिय हहरल।
मघ-असरेस-समान नयन-जल झर-झर झहरल।।

(ख)

मानस भेल विदीर्ण वज्त्र-मर्माहत सुनि-सुनि।
के नहि भेल अधीर तनिक गुण-गौरव गुनि-गुनि।।
कानल मिथिला-मही अपन छाती सिर धुनि-धुनि।
लेखनियो मसि अश्रु-ढारि कानल गुन गुनि-गुनि
छला महा मिथिलेश धर्म-धुरि जन-मन रंजन।
न्यायमूर्ति नीतिज्ञ मैथिलि-लोचन अंजन।।
श्रुति-पथ-पालक प्रवर सुविधि मैथिली संचालक।
शील शौर्य सौजन्य मूर्ति, विद्वज्जन-पालक।।
शास्त्र-ज्ञान-निष्णात अनुप विद्या-अनुरागी।
गुणिगण-गणना-अप्रगण्य सभ विधि बड़ भागी।।
हिन्दुत्वक आधार एक आगार विचारक।
बुधमण्डलिक अमूल्य रत्न, संस्कृति-उद्धारक।।
देव-कार्य-अनुरक्त भक्त निश्चल व्रतधारी।
प्रिय मिथिला-उद्यान बीच स्वच्छन्द-विहारी।।
अनुप दया-भण्डार भार शासन-सुखकारी।
याचक तोषनिहार सुविधि रंकक दुखहारी।
से मिथिलेशक निधन! पड़ल मिथिला सिर डाका।
रचलक कनइत हमर कलम’
नृप-कीर्तिपताका।।
आदि कविक ओ ‘मा निषाद’ सन कविता-धारा।
उमड़ि चलल करुणाश्रु, भरलि भय शोकागार।।
प्रथम काव्य-पुस्तिका यैह विरचल हम कनइत।
छन्द, अलंकारोक ज्ञान किछु छलहुँ न जनइत।।
माँ शारदहिंक करुण-प्रेरणावश रचि गेलहुँ।
छन्द, अलंकृति-छटा देखि मुग्धो बड़ भेलहूँ।।

(ग)

सर कामेश्वर सिंह नव्य मिथिलेशक करमे।
‘किर्त्तिपताका’ भेल समर्पित राज्य-नगरमे।।
सुनि कविता करूणाद्रँ धैर्य तनिकहूँ नहि रहले।
उबडवाय गेल नयन लाल, जल रुकि-रुकि बहले।।

प्रस्तुत शकुन्तलाक विषयमे

किछु दिवसक उपरान्त महाकवि कालीदासक।
अभिज्ञानशाकुन्तलोक नाटक उल्लासक।।
राजा लक्ष्मण सिंह रचित अनुवाद निरेखल।
की अपूर्व रचनाक छटा छवि अद्भुत देखल।।
सिन्धु-लहरि-सम उमड़ि चलल अनुभूतिक धारा।
किन्तु न छल किछु बोध छन्दशास्त्रक ककहारा।।
छल चरणाम्बुज-कृपे मात्र शारदा गणेशक।
तें मन उमड़ल खण्ड-काव्य-उद्यान-प्रवेशक।।
नहि छल नाटक काव्य रुपमे कहुँ अनुवादित।
तें छल बड़ लालसा मैथिलिक सरस सुवासित।।
विविध छन्दमे रची तकर अनुवाद मनोहर।
कयलहुँ स्वान्त-सुखाय सैह प्रस्तुत अछि सुन्दर।
यदपि मूल-रक्षार्थ कयल श्रम धरि हम भारी।
किन्तु विविध त्रुटियो अवश्य होयत छवि-हारी।।
कतय महाकवि कालिदास-कृत कला-मनोहर।
कतय हमर ई खण्डकाव्य रसहीन सरोवर।।