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शकुन्तला / प्राक्कथन / भाग 3 / दामोदर लालदास

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पुनःपुनः प्रथम दर्शन-लालसा-वश शकुन्तलाक गतिस्थिति

दर्भाड्. कुरेण चरणः क्षत इत्यकाण्डे
तन्वी स्थिता कतिचिदेव पदानि गत्वा।
आसीद्विवृत्तवदना च विमोचयन्ती
शाखसु बल्कलमसक्तमपि द्वुमाणाम्।।
मोडि-मोडि मुख नृपक निहारति आनन वारंवार।
अड़इत करइत विविध व्याजसँ पुनि-पुनि रूप-निहार ।।
सखि आगाँ बढ़ि चललि देखि बजली शकुन्तला बाल।
‘ओक्षरालि माधवी-लतामे छी सखि! हम एहि काल।।’

शकुन्तलाक पत्रलेखन

तव न जाने हृदयं मम पुनर्मदनो दिवापि रात्रिमपि।
निष्कृप! तापयति बलीयस्तव हन्त मनोरथानि अंगानि।।
अँहक हृदयक किछु न जानी. केहन प्रीतिक रंग।
मन दशा पर हमर बुझि लिअ ताप दैछ अनंग।।
कहब कहँ धरि अपन दुख हम, दिशि लगैछ अन्हार।
अहिंक दर्शन बिनु विकल अति प्राण प्राणाधार।।

किं शीकरैः क्लमविमर्दिभिराद्र वातं
संचालयामि नलिनीदलतालवृन्तम्।
अंके निधाय चरणावुत पद्मताम्त्रौ
संवाहयामि करभोरु! यथासुखं ते।।
कहल नृप तत्काल प्रेयसिसँ सनेह बढ़ाय।
नलिनिदलहिंक तालवृन्तहिं दी सप्रीति डोलाय।।
होय यदि करभोरू! उपशम तनक ताप विशाल।
अंक लय पद-पद्म नहु-नहु रगड़ि दी किछु काल।।

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोनिधिं वेत्सि न मामुपस्थितम्।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधिताऽपि सन् कथां प्रमत्ताः प्रथम कृतामिव।।

जकर ध्यानमे भेलि निमग्ना दृष्टि एम्हर नहिं लयलें।
विश्वविदित क्रोधी मुनि बुझितहुँ हमर न स्वागत कयलें।।
से दुष्यन्त तैहन भय बिसरत तोहि अभिमानिनि वामा।
यथा मत्त जनकें न पड़य मन पूर्व क्रिया अभिरामा।।
मन नहि पड़त ब्याह स्नेहादिहुं हैत विफल सभ आशा।
बस, ई शाप असत्य न होयत नाम हमार ‘दुर्वासा’।।

(ज)

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्ककण्ठया।
अन्तर्वाष्पभरोपरोधि गदितं चिन्ताजड़ं दर्शनम्।।
वैक्लव्यं मम तवादीद्शमपि स्नेहादरण्यौकसः।
पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाविश्लेषुदुःखैर्नवैः।
कनितहिं धय किछु धैर्य कहल-हम छी वनवासी।
संसारी व्यवहार आदिसँ भेल उदासी।।
पर, हमरहुँ ई दशा जखन बेटीक विदामे।
तखन गृहस्थक दुखक पार ककरा गणनामे।।
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वसिक्तेषु या
नाऽऽदत्ते प्रियमण्डनाऽऽपि भवतां स्नेहेन या पल्लबम्।
आदौ वः कुसुमप्रवृत्तिसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वेरनुज्ञायताम्।।

सोदर सम सम्बन्ध तोहि सभसँ जे जोड़ल।
निज श्रृंगारहुँ हेतु फूल-पातो नहि तोड़ल।।
कुसुमित तोहि विलोकि सदा उत्सव शुभ ठानल।
विनु जल सिंचन ककर नाम जलपान न जानल।।
से शकुन्तला आइ पतिक गृ शुभ-शुभ चलली।
दहुन शुभाशीर्वाद विहगावलि, कोकिल कूजल।
वनदेविक जनु शुभाशीषमय वाणी फूजल।।

रम्यान्तरः कमलिनी हरितैः सरोभिः
छायाद्रु मैर्नियमितार्कमरीचितापः।
भूयात् कुशेशयरजोमृदुरेणुरस्याः
शान्तानुकुलपवनश्च शिवश्च पन्थाः ।।

(झ)

वेश, आब चलु सुते! मार्ग मंगलकारी हो।
शीतल सुखद समीर अँहक पथ श्रमहारी हो।।
दिनमणि-किरण न उग्र होय आतप हो मन्दा।
जल-कमलें परिपूर्ण पथक श्रम हो सुखकन्दा।।
पथमे छाया-द्रुमक सघनता ही सुखकारी।
पथक दिवस हो मधुर, सुखद सभ विधि मनहारी।।
मार्गक उड़इत ‘धूलि कंज-मकरन्दक सम हो।
हो यात्रा शुभमूल मधूर आ’ पथ-श्रम कम हो।।
कि विशेषेण! इत्यलम्।

विनयावनत

दामोदर लाल दास ‘विशारद’