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शफ़क़ की गुल की याक़ूत-ए-यमन की आज़माइश है / राशिद हामिदी

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शफ़क़ की गुल की याक़ूत-ए-यमन की आज़माइश है
हरीफ़ान-ए-लब-ए-ग़ुंचा-दहन की आज़माइश है

बिसात-ए-फ़िक्र पर शेर ओ सुख़न की आज़माइश है
ग़ज़ल के मिश्रा-ए-सानी में फ़न की आज़माइश है

नवाह-ए-क़रिया-ए-जाँ में न जुगनू हैं न तारे हैं
मेरे दिल अब तेरे दाग़-ए-कोहन की आज़माइश है

नई तहज़ीब ने उर्यानियत को दे दिया जामा
बदन के पेच-ओ-ख़म में पैरहन की आज़माइश है

मवाद-ए-शब निगल जाने को है महताब की सूरत
सहर तक अब चराग़-ए-अंजुमन की आज़माइश है

शहीदान-ए-वतन तो इम्तिहाँ से सुर्ख़-रू गुज़रे
मगर अब रह-नुमायन-ए-वतन की आज़माइश है

ये दीनार ओ दिरम किस ने सजाए हैं
यहाँ फिर क्या ज़मीर-ए-हर्फ़ जान की आज़माइश है

क़यामत इस्तिआरा है तेरी अंगड़ाई का जानाँ
दम-ए-महशर तेरे महशर-बदन की आज़माइश है