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शबदेग / सरोज सिंह

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कल सारी रात, तेरे तस्सवुर की आंच पर
मेरे नज़्मों की, शबदेग[1] पकती रही
तुम्हारे होने का एहसास
भट्टी में ईधन लगाता रहा
बारहा, दर्द का धुंआ
आँखों में नमी लाता रहा
हसीं तब्बसुम नज़्मों में
कलछी घुमाता रहा
बंद खिड़कियों पर थपकियाँ
बारिश की आमद बताती रही
आंच दहकती रही, ख्वाब ख़दक़ते रहे
देग से उठती हुई इश्क़ की खुशबुओं से
आलम सारा सराबोर था
मेरे बेक़रार सफ़हों को
बेनज़ीर नज़्मों का इंतज़ार था
मेरी नींद जो अरसों से
पसे-परदा थी, ख्वाबे परीशां थी
जाने किस पहर वो भूख से बेज़ार, नमूदार हुई
शबदेग देख उसके लबों पर तल्ख़ हँसी फिसलती रही
वो ज़ालिम, मेरी नज़्मों का लुकमा निगलती रही
सुबह की पहली किरन ने नींद के जाने की इत्तला दी
उठकर देखा तो...भट्टी में बची थी राख
और गुमसुम पड़े शबदेग के कोरों में
नज़्मों के कुछ लफ्ज़ चिपके पड़े थे l

"आज की रात... मैं नींद पर पहरा दूंगी"

शब्दार्थ
  1. वह हांड़ी जो रातभर पकती है