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शब्द शर वाले धनुर्धर / महेश अनघ

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शब्द-शर वाले धनुर्धर
गोद पाले हैं ।
शस्त्र-शैया पर अमर हम
गीत वाले हैं ।।

राग-रंजित रहे काया
रक्त अपना ही रचाया
समर में स्वाहा किया सब
पंचतत्वों को बचाया

प्रलय में नूतन सृजन के
बीज डाले हैं ।

दर्प को दे दिया दर्पण
फर्ज़ के आगे समर्पण
प्रण किया हमने पिता की
कामना का किया तर्पण

तब कहीं गंगाजली में
व्रण खंगाले हैं ।

नीति के नाते विनत हैं
क्या करें हम देवव्रत हैं
पारदर्शी हैं समय के
अन्धपन के मातहत हैं

द्रोपदी के आँसुओं से
तर दुशाले हैं ।

वार झेला मान जैसा
शत्रु है संतान जैसा
हाथ रिपुदल पर उठा है
विजय के वरदान जैसा

है सदा सद्भाव स्वर में
पाँव छाले हैं