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शब ए ग़म है मेरी तारीक बहुत / ज़िया फ़तेहाबादी

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शब ए ग़म है मेरी तारीक बहुत |
हो न हो सुबह है नज़दीक बहुत |

उन से मैं दूर हुआ ख़ूब हुआ
आ गए वो मेरे नज़दीक बहुत |

ग़म ए जानाँ मेरे दिल से न गया
की ग़म ए दहर ने तहरीक बहुत |

मिल गई मर के हयात ए जावेद
तेरे बीमार हुए ठीक बहुत |

कम से कम हुस्न की रुसवाई में
थी ग़म ए इश्क़ की तज़हीक बहुत |

रहनवरदान ए जुनूँ बैठ गए
मंज़िल ए शौक़ थी नज़दीक बहुत |
 
ऐ " ज़िया " हम को दर ए साक़ी से
कम सही फिर भी मिली भीक बहुत |