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शब तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गये / मोमिन

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शब तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गये|
खोये गये हम ऐसे के अग़्यार पा गये|

मजलिस में उस ने पान दिया अपने हाथ से,
अग़्यार सब्ज़ बख़्त थे हम ज़हर खा गये|

ग़ैरों से हो वो पर्दानशीं क्यों न बेहिजाब,
दम हाय बे-असर मेरे पर्दा उठा गये|

वाइज़ के ज़िक्र-ए-मेहर-ए-क़यामत को क्या कहूँ,
आलम शब-ए-वस्ल के आँखों में छा गये|

दुनिया ही से गया मैं जो नहीं नाज़ से कहा,
अब भी गुमान-ए-बद न गये तेरे या गये|

ऐ "मोमिन" आप कब से हुए बंदा-ए-बुताँ,
बारे हमारे ??? में हज़रत भी आ गये|