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शर्तें समय के दाँव लगाये हुए हैं लोग / उपेन्द्र कुमार

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शर्तें समय के दाँव लगाये हुए हैं लोग
क्या-क्या न ज़िन्दगी को बनाए हुए हैं लोग

ख़ुद को ही ख़ुद से खूब छुपाए हुए हैं लोग
सूरज पे मगर दोष लगाए हुए हैं लोग

अब आईना छुपाइए, चेहरा बचाइए
पत्थर हरेक ओर उठाए हुए हैं लोग

कानून जा छुपा किसी कातिल के शिविर में
इन्साफ की गुहार मचाए हुए हैं लोग

चलिए तिमिर के पार के मंज़र भी देख लें
उम्मीद की मशाल जलाए हुए हैं लोग

चुप्पी तो उनकी सिर्फ छलावा है वक़्त का
दिल में हज़ार ग़म भी छिपाए हुए हैं लोग।