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शर्तों पे अपनी खेलने वाले तो हैं वही / रऊफ़ खैर

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शर्तों पे अपनी खेलने वाले तो हैं वही
मोहरे सफ़ेद घर में भी काले तो हैं वही

शाख़ों पे साँप हैं तो शिकारी हैं ताक में
सहमे परिंदे उन के निवाले तो हैं वही

पहचानने में हम को तकल्लुफ़ हुआ उन्हें
हालाँके अपने जानने वाले तो हैं वही

वारिस बदल गए कि वसीयत बदल गई
लेकिन गवाह और क़बाले तो हैं वही

अब उन पे उँगलियों के निशानात और हैं
हर-चंद अपने क़त्ल के आले तो हैं वही

खिलवाड़ कर रहे थे जो हम से वो खुल गए
ये और बात हीले हवाले तो हैं वही

सारी हयात जिन की अँधेरे में कट गई
अंधेर है कि ‘ख़ैर’ जियाले तो हैं वही