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शस्यश्यामलां / सुशील राकेश

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जुहू-चौपाटी का नाम आते ही
खुल जाती स्मृतियों की कुडंलियां
समुद्र के इस लंबे-चौड़े पाट पर
अनगिनत प्रेम के इकलौते स्त्री-पुरूद्गा
बच्चे-नौजवान आधुनिकता के लिवाज में
नमकीन-जल से/एक-दूसरे का अभिषेक करते
अपने शुद्ध-प्रेम के प्रदर्शन में व्यस्त
विभिन्न तरह की क्रीडा करते
मनोरंजन का सुख झेल रहे हैं
खिल रही ऊष्मा वेमिसाल ।
कुछ बेरोजगार-कलाकार युवक
बालुका-सुख को बकायदा
बड़े-बड़े महापुरुषो/समुद्री जीव-जंतुओं को
उकेरते हुए/कुछ कह रहे हैं मौन
मौन बौछार में दर्शक कुछ-न-कुछ
ठिठुरती हुई खालिस मुद्रा फेंक कर
दिन-प्रतिदिन की श्रृंखला को
कायम रखना चाहते हुए देते हैं भेंट
भेंट से बेरोजगार-युवकों का
एकाकीपन टूटता हुआ
देखता है स्वप्न ।
इस चौपाटी की एक-एक सीढ़ी पर
चढते हुए नन्हें-मुन्हें बच्चे भी
शस्यश्यामलां मातरम्‌ में डूबे
घुमड़ते / सलोने / स्निग्ध
पौरुष के पर्याय/और प्रियतमा की
पुकार हैं/एक नये स्वप्न की दरकार हैं
समुद्र की इस तलहटी पर
व्यस्त है सभी
सभी के अपने भिन्न-भिन्न करतब हैं
सब को लुभाते हैं
जैसे बहार को बाल्टी से
उडेल दिया हो
या ऐलान है बच्चों का
कि आओ शस्यश्यामलां मातरम्‌ की
यात्रा में/पुनः जी लो
पुनः जी लो ।