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शहर जले चीख़े आबादी / विजय किशोर मानव

शहर जले चीख़े आबादी
सर थामे बैठी आज़ादी

सही पहरुओं की तलाश है,
मुद्दत से पिट रही मुनादी

क्या सुराज, क्या प्रजातंत्र है
लाठी से पिटते फ़रियादी

भेद नहीं करती गुनाह में,
पर्दा डाल रही है खादी

गया ग़दर का दौर अकारथ,
भर लेती हैं आंखें दादी

अरसे से सो रहे पहरुए,
बस्ती है जगने की आदी