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शांत जंगल है / कुमार रवींद्र

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राह सूनी
शांत जंगल है
हवा भी चुप खड़ी है

मौन है आकाश
झरने धुंध की चादर लपेटे
झील पर सुख से बिरछ
परछाइयों को लिए लेटे

पास के
बाजार में भी
नहीं कोई हड़बड़ी है

सो रहे हैं बर्फ के नीचे
अभी मधुमास के दिन
मुँह-ढँके छिपकर कहीं
बैठी अकेली धूप कमसिन

इधर पिछली
रात की
बीमार परछाईं पड़ी है

जप रहा है रोशनी के मंत्र
पर्वत का शिखर वह
सूर्यरथ का बावरा घोड़ा
सिहरता उधर रह-रह

पास के इस
पेड़ की भी
आखिरी पत्ती झड़ी है