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शाख़ पे इक चिड़िया बैठी थी / नासिर परवेज़

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शाख़ पे इक चिड़िया बैठी थी
उस के लब पर ख़ामोशी थी

आज मैं दिन भर चुप चुप सा था
आज तबीअत बोझल सी थी

मेरे घर की दीवारों से
बे ख़्वाबी सर फोड़ रही थी

एक तिरे ही कान न फूटे
चीख़ मिरी किस किस ने सुनी थी

दिल की आग बुझाता कैसे?
दरियाओं में आग लगी थी

कमरे में और क्या रक्खा था
ख़ामोशी थी, चीख़ रही थी

सब का अपना दुख था नासिर
सब को अपनी अपनी पड़ी थी