भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

शाम के साहिल से उठकर चल दिए / ओम प्रभाकर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

शाम के साहिल से उठकर चल दिए
दिन समेटा, रात के घर चल दिए।

हर तरफ़ से लौटकर आख़िर तभी
तेरे मक़्तल की तरफ़ सर चल दिए।

इक अज़ाने बेनवा ऎसी उठी
झूम कर मिनारो-मिम्बर चल दिए।

है उफ़क के पार सबका आशियाँ
ये सुना तो सारे बेघर चल दिए।

छू गए गर तेरे दामन से कभी
ख़ार भी होकर मुअत्तर चल दिए।

शब्दार्थ:
मक़्तल=वधस्थल
अज़ाने बेनवा=निशब्द अज़ान
मीनारो-मिम्बर=मस्जिद में वह ऊँचा स्थान जहाँ से अजान दी जाती है
मुअत्तर=सुवासित