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शिकायत / शिशु पाल सिंह 'शिशु'

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जब कार्य अधूरा छूट गया, कारण की शिकायत कर बैठे
साध की न देखीदुर्बलता, साधन की शिकायत कर बैठे

माँ के चरणों में शीश चढ़ा , किसने आशीष नहीं पाई
केवल भयभीत पुजारी ही, पूजन की शिकायतकर बैठे

जीवट वाले तो मर कर भी, युग- युग तक जीवित रहते हैं
मरने सेडरने वाले ही, जीवन की शिकायत कर बैठे

आखों की तिल सीपुतली में, काली आँधी भरने वाले
अपने मद की दवा न करके, यौवन की शिकायत कर बैठे

यद्यपि हांथो ने हँस- हँसकर, खुद ही हथकड़ियाँ पहनी हैं
फिर भी गलती स्वीकार न कर, बंधन की शिकायत कर बैठे

जिनकों न नाचना आता है, गति- ताल आदि का ज्ञान नहीं
वे टेढ़ा- मेढ़ा बतला कर, आँगन की शिकायत कर बैठे

आँचल उलझा कर शूलों में, फूलों का घर तक जान सके
असफलता की झुंझलाहट में उपवन की शिकायत कर बैठे

कोपल किसलय, किसलय कलिका, कलिका हँस-हँस कर कुसुम बनी
बस डंक उठाये काँटें ही, मधुवन की शिकायत कर बैठे

जबह्रदय हरा करने वाली, अम्बरसे बरसी हरियाली
तब जी के जले जवासे ही, सावन की शिकायत कर बैठे

जो चाटुकार है वह मुँह पर, मुँह देखी बात करेगा ही
तुम नाहक पीछे द्रष्टि डाल, दर्पण की शिकायत कर बैठे

सम्मोहन- मंत्रों में फँसकर, मायावी मोह न छोड़ सके
राधा सी उलटीधारा में, मोहन की शिकायत कर बैठे