भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

शिव जी हीरो बनोॅ हो-33 / अच्युतानन्द चौधरी 'लाल'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गरमी-पुराण

मक्खर के मेलै भरमार गरमी आबी गेलै
भन्न भन्न भन्न भन्न मक्खर के पलटन
सन्न सन्न पछिया बयार गरमी आबी गेलै।।
मक्खर के दुष्टोॅ के एक्के तरीका
गोड़ पकड़ै के पहलोॅ सलीका
पीछू सें सुइया हजार गरमी आबी गेलै।।
मारे पसीना के लस्स लस्स देहिया
धूरा सें गरदा सें भरलोॅ देहरिया
रौदी सें छै हाहाकार गरमी आबी गेलै।।
सब के पियासोॅ बेकल परान यहाँ
दिनोॅ नै रातीं नैं केकर हो तरान यहां
गरमी सें सब छै बेजार गरमी आबी गेलै।।
उपरोॅ सें बरसै छै किरनोॅ के गोला
निकलै छै धरती सें लह लह शोला
ठंढा के कुछ नै ठहार गरमी आबी गेलै।।
मक्खर सें तनियोटा मांछी नै पीछू छै
दिन भरी लोगोॅ कॅ मांछी सता वै छै
करतें रहै छै कचार गरमी आबी गेलै।।
कलरा फलेरिया अनेमिया मलेरिया
सरदी बोखार घाव फसरी निमोनिया
सब के भेलै परचार गरमी आबी गेलै।।
अस्पताल सब नरसिंह होम भरलोॅ छै
रोगोॅ सें लोगोॅ मंे त्राहि त्राहि मचलोॅ छै
डाक्टर के अइलै बहार गरमी आबी गेलै।।
शादी के बोहा के गरमी में बाढ़ यहां
होयछै सराती बराती तबाह यहां
कुछ नै करै छै बिचार गरमी आबी गेलै।।