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शुक्र को शिकवा-ए-जफ़ा समझे / 'शोला' अलीगढ़ी

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शुक्र को शिकवा-ए-जफ़ा समझे
क्या कहा मैं ने आप क्या समझे

हम तिरी बात नासेहा समझे
कोई समझै हुए को क्या समझे

मरज़ुल-मौत को शिफ़ा समझे
दर्द को जान की दवा समझे

इस तड़पने को मुद्दआ समझे
दिल-ए-बद-ख़ू तुझे ख़ुदा समझे

कर दिए इक जहाँ के बुत-ए-ख़ुद-बीं
ऐ सिंकदर तुझे ख़ुदा समझे

‘शोला’ कल ही तो मय-कदे में थे
आज तुम किसी को पारसा समझे