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शेष रहे हिलते रूमाल / कुमार रवींद्र

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ट्रेन गई
शेष रहे हिलते रूमाल
लौट रहे क़दमों की थकी हुई चाल
 
मौन हुए प्लेटफार्म
पटरियाँ उदास
ऊब-थकन-सन्नाटे
लौट आए पास
 
पिछली घटनाओं के सिर्फ़ बचे ख्याल
 
यादों में काँप रहे
कुछ दिन के साथ
विदा उन्हें देते
या जुड़े हुए हाथ
 
सब कुछ है ठहर गया - घर-बगिया-ताल
 
वापस सुख आएँगे
कितने दिन बाद
सोच रहीं संध्याएँ
बीते संवाद
 
आकृतियाँ गुमसुम हैं - खाली दीवाल