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शोकगीत : एक लडकी की आत्मह्त्या पर / ऋषभ देव शर्मा

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दहक रही यह चिता तुम्हारी, धधक रहे अंगारे .
तरुणि! तुम्हारे अल्हड यौवन को लपटें शृंगारें .
कौन सुन रहा है मरघट में, विकल ह्रदय का रोदन ?
केवल तीक्ष्ण हवाएं करतीं , 'सांय-सांय' अनुमोदन.
अरी कुमारी, सखी, वेदने, ओ दर्दों की बेटी !
असमय परिचित हुई मृत्यु से, और चिता में लेटी .

चिता ही है जीवन का सार.
देवि! नश्वर सारा संसार..[ १ ]


प्रसव क्षणों की महावेदना से जब मुक्ति जुटा कर.
जिस दिन पहले-पहल सखी! तुम रोईं जग में आकर .
सोच रहा था नन्हा मन, यह जीवन का वरदान मिला.
इसीलिए तो रोकर के भी, नादानी में फूल खिला.
किंतु तुम्हें क्या ज्ञात, उसी क्षण क्या जननी पर बीता.
रोया उन्मन निर्धन बापू, देख देख घर रीता.

ज्ञात था उन्हें विश्व का सार .
बिना धन जीवन है निस्सार. [२]


खेलीं छोटे से आँगन में ,जब तुम किलक किलक कर .
भरा अंक में जब जननी ने तुमको पुलक पुलक कर.
मुस्कानों से नन्हीं बाला ! तुमने फूल खिलाए .
औ' ललाट पर निज बापू के स्नेहिल चुम्बन पाए .
रहीं खेलती और किलकती , पुलक रहीं मन ही मन.
तुम क्या जानी गृह स्वामी का कैसे सुलगा जीवन ?

निरीहों पर फणि की फुंकार.
निर्धनों पर विधि की हुंकार..[३]


यदा कदा चलता ही रहता अन्न अभाव उपवास.
कई दिनों तक जीते रहते पीकर बस वातास.
किंतु तुम्हें तो सखी! सदा ही दूध खरीद पिलाया.
शुष्क छातियों से पिलवाती क्या निर्धन की जाया ?
रहीं अपरिचित कैसे घर में हर प्राणी जीता है.
केवल दर्द भरा है सबमें शेष सभी रीता है.

मिला उनको शून्य उपहार.
हँसा उनपर अपना संसार .. [४]


गली मुहल्ले में जाकर भी , सखी , बहुत तुम खेली.
निर्धनता किसको कहते हैं ? समझ न सकीं , सहेली!
बचपन में जितनी लीलाएं की होंगी सीता ने.
जितना स्नेह दिया गोपों को प्रिय बाला राधा ने.
रंकसुते ! तुमने भी उतनी लीला करनी चाहीं.
मन का सारा स्नेह उडेला ,सखियों की गलबाहीं .

साम्य का बचपन में विस्तार .
मुग्ध जिस पर कवि का संसार .. [५]


याद नहीं या वह दिन तुमको? मरघट की सुकुमारी !
जिस दिन नभ में रंग उड़ा था, गलियों में पिचकारी..
देख रही थीं तुम क्रीडा को, निज प्यासा मन मारे .
स्नेहमयी माता शैया पर पड़ी रोग तन धारे.
बदन तप्त था ,बस गृहस्वामी खड़ा हुआ सिरहाने .
मन ही मन था देव मनाता , बुरा किया विधना ने !

फागुन पर बिजली का प्रहार.
सूना फाग , निर्धन घर-बार ..[६]


फ़िर दीवाली भी तो आई , जगमग जगमग करती .
धनिकों के ऊंचे महलों में दीप शिखाएं धरती
अंधकार में रही उपेक्षित किंतु तुम्हारी कुटिया .
जला न चूल्हा तक पर वैभव जला रहा फुल झडियाँ .. ..
पहली बार बताया माँ ने बेटी , हम गरीब हैं.
रो मत मांग न खील खिलौने , बेटी , हम गरीब हैं.

गरीबी का पहला उपहार
भावना का निर्मम संहार .. [७]


अब तक तो सब ही मानव थे सखी तुम्हारे लेखे
किंतु वर्ग दो उस दिन तुमने अपनी आंखों देखे.
टुकडे कर डाले मानस के नर ने धन के पीछे
मानव स्वयं समाज मध्य ही सीमा रेखा खींचे
प्रश्न उठा था उस दिन मन में ,किसने करी व्यवस्था ?
समझ न सकी पहेली लेकिन , रही अबोध अवस्था

बने सपने झंझा अवतार
रुदन ही निर्धन का आधार [८]


धीरे धीरे सखी खो रहीं थीं तुम अपना बचपन
.इठलाना इतराना यों ही सीख रहा था जीवन.
तभी तुम्हारी एक सहेली , विदा हुई ससुराल
लाखों की संपत्ति गई थी यह धनिकों की चाल .
बिखर रहे थे जब डोली पर खन खन खोटे सिक्के .
लूट रही थीं तुम भी उनको, खाकर धक्के मुक्के

वधू ने किए सभी श्रृंगार
देख मचला मन का संसार . [९]


एक कल्पना मन में बैठी ,है मुझको भी सजना
हाथों में रचनी है मेहदी , चरण महावर रचना
स्वर्ण भूषणों से लद करके मुझको भी जाना है.
और स्वर्ण से कीर्तिमान निज साजन को पाना है.
पति-इच्छा ने तुमको क्रमश: यौवन दिया कुमारी
होठों पर मीठी मुस्कानें ,आँखें ज़हर कटारी
.
रूपरेखा मनसिज की मार
बिंधा फूलों से ही संसार .. [१०]


कठिन हैं कठिन,किशोरी , सत्य , पुष्प-धन्वा के तीर .
कठिन है कठिन कुंवारी आयु , कठिन रीता पण पीर ..
बांधता काम देव का पाश , स्वयं चंचल मन उन्को.
प्रकृति को सदा पुरूष के साथ ,यौवन से यौवन को ..
रहीं चूमती तुम अपना ही बिम्ब देख दर्पण में .
शर की नोक लिए हाथों में ,मदन लगा सर्जन में.

सीखने लगीं प्रेम व्यवहार
चुभाता सूनापन अब खार ..[११]


स्वप्न के कुशल चितेरे ने निशा के काले पट पर.
अनोखे चित्र खींच डाले नयन में दो क्षण रुक कर..
मिला पलकों की रेखा को अनोखा बांक पाना ,री !
देह - आकर्षण दुगुना हुआ, हुई कटि क्षीण तुम्हारी ..
मन ने देखे सपने घोडे वाले राज कुँवर के
अंग अंग में मन-रंजन के , चुम्बन -आलिंगन के...

तुम्हारा यौवन का संभार !
पिता पर चिंता ,दुर्वह भार !![१२]
 

बाप हो चला बूढा, तुम थीं युवा हो रही आतुर
मिला चाँद का रूप तुम्हें औ' मधुर कोकिला के सुर ..
जाने किस दिन हाथ सुता के हो पायेंगे पीले?
इस चिंता में स्वयं पिता के अंग हो चले ढीले
एक प्रश्न था बस दहेज़ का उस निर्धन के आगे
पुत्री उसे मिली अनमाँगे , कौन पाप थे जागे !
 
सबसे कम माँगे दस हज़ार.*
दिशाएं करतीं हाहाकार [१३]
[*यह घटना १९७४ में कोडरमा,बिहार में घटित हुई थी.]


निर्धन की एक मात्र पूंजी , हा ! बस तुम थीं, रूपसि !
जिसकेलिए जिया था अबतक वह तुम ही थीं , रूपसि !
कब तक घर में तुम्हें कुँवारी बैठाए रख पाता
आंखों आगे कामदेव के तीरों से मरवाता
पर पैसे के बिना विश्व में क्या कुछ हो पाता है?
सब रिश्ते झूठे हैं जग में ,धन सच्चा नाता है!

गरीबों पर बेटी का भार !
विश्व में कौन करे उद्धार?[१४]


विवश पिता ने जाना केवल, अपना एक सहारा .
भीख माँगने हर चौखट पर उसने हाथ पसारा..
यह कंगाली की सीमा थी , सौदा नव यौवन का.
मौन देखता रहा विश्व यह नुच-लुटना तन-मन का..
किंतु तुम्हारा मान किशोरी! आहत होकर जागा.
खा न सका वह जगती को तो तुमको डसने भागा..

हुई थी सचमुच गहरी मार .
प्रकम्पित था मन का संसार..[१५]


मान? मान के पीछे जग में हुआ नहीं है क्या-क्या?
अति विचित्र इतिहास मान का ,सुना नहीं है क्या-क्या?
अधरों तक आकर भी प्याला,लौट चले जब यों ही.
स्वप्निल पलकें अविचुम्बित ही उठ जाएँ जब यों ही..
उठी रहें अम्बर में बाहें, बिकें विकल आलिंगन.
आशाएं हिम से आहत हों, उपालंभ दे कण-कण.

क्षुब्ध करती मन का संसार.
टूटते तारों की झंकार.. [१६]


रोती रहीं रात भर तुम यों, अब क्या होने वाला?
भर-भर करके रहीं रीतती, तुम आंखों का प्याला..
आह! प्रेयसी! सूज गए वे आकर्षणमय लोचन.
तरुणाई अभिशाप बन गई , ज़हर बन गया यौवन..
सब सोए थे बेसुध होकर, तुम उठ चलीं अकेली.
सूने पनघट पर पहुँचीं तुम, बहुत वेदना झेली..

हुआ जलमग्न श्वास संसार
गईं तुम जगती के उस पार..[१७]


रोकर बापू तुम्हें ले चला पनघट से मरघट को .
पर घट से क्या तुम्हें प्रयोजन ,पार किया अवघट को..
घट बनकर तुम स्वयं पी चुकीं सारा ही पनघट तो.
केवल रस्म मात्र को फूटा मरघट में वह घट तो..
जली स्वर्ण सी देह चिता में अलकों का वह मधुवन.
जला और जल गया अचानक मौन अकेला यौवन..

चिता ही है जीवन का सार!
देवि! नश्वर सारा संसार !![१८]