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श्यामा को थिरकने दो / मंजुला सक्सेना

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मोहक फूल, मादक मधुगंध, भिन्नातीं मत्त मधुमक्षिकाएँ-सर्वत्र ;
रजत चन्द्र–निर्झर, मधु-स्मित, ये जो स्वर्गलोक के वासी,
सहज प्रसारित करते धरती के घर-घर पर !
मलय पवन की कोमलता की मादक सिहरन,
उड़ा चली संग मन, पूर्व स्मृतियों के वन,
मर्मर सरिताएँ , निर्झर; आलोड़ित झीलें,
आकुल-विकल चक्र में भटकें, श्याम भ्रमर-गण,
अगणित कमल झूम कर के इठलाते.. फेनिल बहते जल धारे–झरते,
जैसे स्वर-प्रत्यावर्तित कर देती जो गिरी कन्दरा ;
कूजित खग-कुल, करें प्रसारित गान श्रुति-मधुर,
छिपे वृक्ष में, ह्रदय सुनाते उनके, प्रेम शास्त्र के प्रवचन;
प्रात का अरुण, झाँक रहा अम्बर आनन् में, दिव्य चितेरा,
छू भर देता ज्यूँ अपनी स्वर्णिम कूची से, धरती का पट
और असीमित रंगों-वर्णों के अनंत गण, छा जाते चहुँ ओर
वसुंधरा के आँचल पर, -सत्य, यही है कोष मनोहर-वर्ण-स्वरों का
उमड़ाता जो एक उदधि मधुमय भावों का.
गर्जन, घिरते, फट पड़ते से मेह तुमुल का,
समर पञ्च तत्त्वों का धरती से अम्बर तक ;
तम उडेलता, - दृष्टि विदारक घोर अन्धेरा,
प्रलयंकारी पवन प्रचंड भर-भर हुंकारें ; रह रह कर चमके.
दमके घनघोर दामिनी रक्तिम, दारुण तड़ित,मृत्यु की ज्यूँ हो दूत ,
दैत्याकारा लहरें कड़क, कुलिश,फेनिल सी, दौड़ें तत्पर,
करने अंगीकृत, गिरिश्रिंग; चीत्कार करती धरती,उद्वेलित - डगमग ,
होजाती ज्यूँ ध्वस्त, देख सब तितर -बितर ; चीर धरा अन्तःस्थल,
उगले भीषण ज्वाला, धूल धूसरित हो जाते हिमाच्छादित गिरिश्रिंग.
मनमोहक प्रासाद, किनारे नील जलाशय, खिले कुमुदिनी-दल के पहने ज्यूँ आभूषण ,
पके अंगूरों के अंतस की मादक मदिरा,शुभ्र फेन का ओढें आँचल
कहतीं धीमे स्वर में कितनी प्रेम कथाएं ; वीणा के तारों के स्वर, कानों में झंकृत,
सुरभि,समय,स्वर संगती का मादक मिश्रण, जागृत करते तीक्ष्ण पिपासा मानव-उर में,
कोलाहाल कैसा भावों का ! जाने कितने दग्ध प्रेमियों की उच्छवासें !
और उफनते,बहते, कितने अश्रुधारें! यौवन से मदमाते बिम्ब सदृश्य दो अधर,
नयन, भरे दो सागर जैसे हों भावों के; बाहें - जैसे आतुर करने प्रेमाबद्ध,
विकल पक्षी सा मन बेचारा जाता फंस. युद्ध भेरी सी बजे ,निनादित तुमुल घोष है,
वीरों के पद तल, डगमग सी कम्पित भूमि , 'तोपें गरजें, खनक रहीं बंदूकों की नालें,
भीषण धूम्र.लोहित रण प्रांगण, धाँय धायं धधकें युद्ध आयुध,आग उगलतीं दसों दिशाएँ
विस्फोट हर और बींधते , अंतरतम तक देहों को ;
हाथी घोड़े योद्धाओं के उड़ जाते हो चिंदी चिंदी ;
धरा कांपती, उग्र ध्वंस से; कोटि सहस्त्र अश्वारोही.. बढ़ें,
छीन अरि आयुध- कोष , चीर धुंआ,बम की बोछारें,
गोली की बरसात मध्य, बढ़ रही पताका, ध्वजा विजय की,शूर वीर की,
रक्त अभी तक ऊष्ण,बह रहा प्रतिक्षण जिससे, पीछे चलती अगणित बंदूकें,
उन्मत्त, युद्धातुर ; अरे! ध्वजा गिरपडी, किन्तु बढ़ती है सेना..
एक दूसरे के कंधे पर जैसे चढ़ के ; पद तल जैसे दलित हो रहे शूर अनेकों,
मिटें युद्ध में;पर न रुके वे. देह खोजती इन्द्रिय सुख को,
इन्द्रियां खोजें मोहक प्रेय, मन भूखा उन्मुक्त हास्य का ,
ह्रदय चाहे रहूं दुख से दूर ; कौन चाहता छिने चांदनी बदले में ले, तपती धूप?
धूर्त व्यक्ति पर को झुलसाए, सूर्य के सदृश्य पर चाहे अपने को,
पाऊं शीतल राका ; सत्य, सभी प्यासे हैं सुख के. सांस ले रहा धूर्त है वहां
कौन भला पाले पीड़ा - दुःख ? सुख के प्याले में भरकर दुख,
अमृतमय पेय में अहि- विष , कंठ में गरल,- आशा पोषित !
अरे! सभी कैसे भय व्याकुल , कोई न चाहे एलोकेशी जो है मृत्यु मय.
कंपा रही तलवार, टपकता जिससे शोणित, छीन, उसे दे देते कर में, सुन्दर वीणा!
तू भयंकरी काली,तू सर्व नाशिनी , सत्य यही केवल;तेरी छाया की छाया..
हैं इतना सुन्दर लगने वाला वह वनमाली .
हे भयावह माँ,काट उर के बंधन,त्वर , मिटा मोह भ्रम - सपने सुख के ,
छिन्न -भिन्न कर, आकर्षण जग के . सत्य सजाते पहले तुझको नरमुंडों से..
पर घबरा, हट जाते पीछे.......... भयाक्रांत होकर हैं कहते ,-" हे करुणामयी !
" अट्टहास और भयानक गर्जन तेरा , दिगम्बरी तू -क्यूँ की आवरण अम्बर तेरा -
भय से आकुल हो जाते उर,पर हैं कहते , "मातु हन्त्री है दानव गण की !"
दर्शन तेरा पाने को केवल वे कहते, प्रकट हुयी तू जिस पल, वे भागें फिर सरपट.
तू मृत्यु है ! सृष्टि के हर एक प्राणी को बाँट रही तू घातक रोग,
गरल पात्र भरती है तू ही . तू मदमाती!छले स्वयं को,
मूंह न मोढ़े ,नहीं निहारे, हे भयंकरी रूप, मात्रिके !
आस में सुख की कष्ट उठाती , धारे भक्ति भाव-परिधान ,
मन में केवल स्वार्थ सिद्दी है , शिशु के कटे शीर्ष का शोणित ,
भर देता भय - कांपता ह्रदय.. क्या कायरता ! क्या है करूणा?
वर दे मुझ को !है विचित्र यह लीला कैसी !
किसे बताऊँ सत्य भला क्या ?-कौन देखता ?
मुक्त करो अपने को जग के कुटिल राग से.
प्रेम की सुरा मादक ,दुर्गम भोग पिपासा . तोड़ो वीणा !
रहो अग्रसर,सागर के संग ! पीलो अश्रु ,हारो जीवन-
देह की भी न आसक्ति हो. जागो ,नायक !
मिटने दो भ्रामक सपनों को, कितनी पीड़ा!,सत्य यही है -
यह सब होना - जानो यह ही है ईश्वर ! उसका मंदिर -
मृतक भूमि भरी लाशों से , और धधकती हुयी चिताएं ;
अविरत समर - सत्य में यही पूजन उसका ; सतत हार हो -
त्यागो न साहस ; क्षुद्र अहम् ,आशा ,यश ,नाम बिखरते ;
उन्हें झोंक दो अग्नि चिता में और ह्रदय ज्यूँ हो शमशान .
और थिरकने दो श्यामा को अपने उर में...


स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित मूल अंग्रेज़ी रचना
let shyama dance


The roll of thunder, the crashing of clouds,
War of elements spreading earth and sky;
Darkness vomiting forth blinding darkness,
The Pralaya wind angrily roaring;
In quick bursts of dazzling splendour flashes
Blood-red terrific lightning, dealing death;
Monster waves roaring like thunder, foaming,
Rush impetuous to leap mountain peaks;
The earth booms furious, reels and totters,
Sinks down to its ruin, hurled from its place;
Piercing the ground, stream forth tremendous flames,
Mighty ranges blow up into atoms.
A lovely villa, on a lake of blue--
Festooned with clusters of water-lilies;
The heart-blood of ripe grapes capped with white foam
Whispering softly tells tale of passion;
The melody of the harp floods the ears,
And by its air, time, and harmony rich,
Enhances desire in the breast of man;
What stirring of emotions! How many
Hot sighs of Love! And warm tears coursing down!
The Bimba -red lips of the youthful fair,
The two blue eyes--two oceans of feelings;
The two hands eager to advance--love's cage--
In which the heart, like a bird, lies captive.
The martial music bursts, the trumpets blow,
The ground shakes under the warriors' tread;
The roar of cannon, the rattle of guns,
Volumes of smoke, the gruesome battlefield's
The thundering artillery vomits fire..
In thousand directions; shells burst and strike
Vital parts of the body; elephants..
And horses mounted are blown up in space;
The earth trembles under this infernal dance;
A million heroes mounted on steeds
Charge and capture the enemy's ordnance,
Piercing through the smoke and shower of shells
And rain of bullets; forward goes the flag,
The emblem of victory, of heroism
With the blood, yet hot, streaming down the staff,
Followed by the rifles, drunk with war-spirit;
Lo! the ensign falls, but the flag proceeds
Onwards on the shoulder of another;
Under his feet swell heaps of warriors
Perished in battle; but he falters not.
The flesh hankers for contacts of pleasure,
The senses for enchanting strains of song,
The mind hungers for peals of laughter sweet,
The heart pants to reach realms beyond sorrow;
Say, who cares exchange the soothing moonlight
For the burning rays of the noontide sun?
The wretch whose heart is like the scorching sun,
--Even he fondly loves the balmy moon;
Indeed, all thirst for joy. Breathes there the wretch
Who hugs pain and sorrow to his bosom?
Misery in his cup of happiness,
Deadly venom in his drink of nectar,
Poison in his throat--yet he clings to hope!
Lo! how all are scared by the Terrific,
None seek Elokeshi whose form is Death.
The deadly frightful sword, reeking with blood,
They take from Her hand, and put a lute instead!
Thou dreaded Kali, the All-destroyer,
Thou alone art true; Thy shadow's shadow
Is indeed the pleasant Vanamali.
O Terrible Mother, cut quick the core,
Illusion dispel--the dream of happiness,
Rend asunder the fondness for the flesh.
True, they garland Thee with skulls, but shrink back
In fright and call Thee, "O All-merciful!"
At Thy thunder peal of awful laughter,
At Thy nudeness--for space is thy garment--
Their hearts sink down with terror, but they say,
"It is the demons that the Mother kills!"
They only pretend they wish to see Thee,
But when the time comes, at Thy sight they flee.
Thou art Death! To each and all in the world
Thou distributest the plague and disease
--Vessels of venom filled by Thine own hands.
O thou insane! Thou but cheatest thyself,
Thou dost not turn thy head lest thou behold,
Ay, the form terrible of the Mother.
Thou courtest hardship hoping happiness,
Thou wearest cloak of Bhakti and worship,
With mind full of achieving selfish ends.
The blood from the severed head of a kid
Fills thee with fear--thy heart throbs at the sight-
Verily a coward! Compassionate?
Bless my soul! A strange state of things indeed!
To whom shall I tell the truth?--Who will see?
Free thyself from the mighty attraction--
The maddening wine of love, the charm of sex
Break the harp! Forward, with the ocean's cry!
Drink tears, pledge even life--let the body fall
Awake, O hero! Shake off thy vain dreams,
Death stands at thy head--does fear become thee?
A load of misery, true though it is--
This Becoming --know this to be thy God!
His temple--the Shmashan among corpses
And funeral pyres; unending battle--
That verily is His sacred worship;
Constant defeat--let that not unnerve thee;
Shattered be little self, hope, name, and fame;
Set up a pyre of them and make thy heart..
A burning-ground...
And let Shyama dance there.