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श्रद्धा -विश्वास / शिव कुमार झा 'टिल्लू'

चंद दूरियाँ लिए यह शाब्दिक मित्र
हर विचारमूलक साहित्य में
होते हैं प्रयुक्त ...
जैसे विलग गोत्रधारी नरनारी
क्षण में एक संग ध्रुव के आभारी
निशावेला का एकभुक्त
आर्य ब्रह्मदर्शन का सूक्त !
दोनों विरक्त और स्वछन्द
कितने फर्क हैं इनमें
कोई नहीं परस्पर तारतम्य
शब्दांकुर उच्चारण- अर्थ -मूल और भावों में
लेकिन जीवन के गुंथिल उन्मुक्त
रहस्यों में ...
रहते हैं जीते हैं
साथ साथ
सहचरी दम्पति की तरह
किसी आशु कवि के साधना की तरह
विह्वल वैरागी के आराधना की तरह...
श्रद्धा है.... तुमसे धरती
तुम्ही से आकाश
तुम्हीं से उच्छ्वास
तुम्हीं से विश्वास ...
एक के बिना दूजे का कोई मोल नहीं
एक मूक तो परकंठ में बोल नहीं ..
इन पवित्र जोड़ियों का करो आलिंगन
नहीं होगी क्षणिक भी विचलन
इन आरोही -अवरोही जीवन पथ पर
ना भय तुम्हें किसी का!
ना कोई अवसाद
ना कोई अनर्गल लांछना
ना किसी से विवाद
जियोगे उन्मुक्त जीवन
गगन की तरह
पर क्षणिक वायु -बादल का भी नहीं भय
आत्मा का तृण तृण निर्भय
तुम्हारी ही वसुन्धरे
तुम्हारा ही आकाश
मात्र जगा लो अपने विचार से
रीति से व्यवहार से
अपने प्रति लोगों का
नहीं नहीं चलाचल जैव जगत का
'श्रद्धा और विश्वास '