श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता।
जो इनकी शरण जात है दौरि के, ताहि को तीहिं छिनु कर सनाथा॥१॥
एहि गुन गान रसखान रसना एक सहस्त्र रसना क्यों न दइ विधाता।
गोविन्द प्रभु तन मन धन वारने, सबहि को जीवन इनही के जु हाथा॥२॥
श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता।
जो इनकी शरण जात है दौरि के, ताहि को तीहिं छिनु कर सनाथा॥१॥
एहि गुन गान रसखान रसना एक सहस्त्र रसना क्यों न दइ विधाता।
गोविन्द प्रभु तन मन धन वारने, सबहि को जीवन इनही के जु हाथा॥२॥