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सती परीक्षा / सर्ग 2 / सुमन सूरो

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अशोक बनिका में राम

बन-अशोक, श्लिा एक, चिन्ता रत,
बैठलोॅ छै समाधिस्त राम;
एकाकी जिनगी के ज्वाला में दहलोॅ छै;
सन्यासी, अनपूरित काम॥

सोचै छै राजमुकुट राखैजेॅ भेॅ गेलै,
हमरा सें बड़का अपराध।
स्वार्थोॅ के सिद्धी में हमरासें छोटोॅ छै;
दुनियाँ के पापी सब व्याध।

अबला वैदेही के निर्मल चरित्रोॅ पर,
डालीकेॅ ऐहनोॅ अन्याय।
केना केॅ डिगलोॅ छै राजाके सिहासन;
केनाकेॅ डिगलोॅ छै न्याय॥

लौकिक अपवादोॅ केॅ मानदण्ड मानी केॅ
अपराधी कहना अबिचार।
सजाबार करना कोय निर्मल-निर्दोषोॅ केॅ;
राजा केॅ नैं छै अधिकार।

जैहना कलंकोॅ के टीका नुकाबै में
चन्दा छै बेबस-लाचार।
वहेॅ रं राम के राजोॅ के छाती पर;
रहतै ई सबदिन सबार॥

अपना केॅ लोगोॅ के नजरीं उठाबै लेॅ,
नजरी में केकर्हौ गिराय।
एकरा सें निर्धिन की काम छै दुनियाँ में,
हमरा सें के छेॅ अताय?॥

ग्लानी के ज्वारोॅ में हिरदय उतराय छै,
आँखी में सीता के रूप।
मानोॅ जे घिरना उड़ेली केॅ बोलै छै-
”चिन्हलिहौं तोरा हे भूप“॥

”मर्जादा पुरुषोत्तम खुद केॅ कहाबै लेॅ,
कोनों कुकर्मोॅ सें बाज।
तोहें नै आबैछोॅ, न्यायी कहाबै में;
तनियों नी लागै छौं लाज“॥

”मुखड़ा सलोना छौं, कट्ठर करेजा के,
दया के नै छौं दरेस।
ओकरहौ पर किरपा-निधान कहाबै छोॅ;
छलिया, फरेबो रं भेस॥

”अच्छा तेॅ होतियै जे लंका में तेजी केॅ,
सागर केॅ आकी चढ़ाय।
दण्डक वन बीचोॅ में फेकतिया काटी केॅ,
टलतिहौं सबटा बलाय

”चिन्हारी होतिहौं यै रूपोॅ के कहियो नो,
सपना के होतियै नै भंग।
मिरतू के धारा मंे भाँसतियाँ सुक्खोॅ सै;
मोहिनी-मुरती के संग॥

”जे मुर्ती जनकपुरी फुलबाड़ी के थाती,
जे मुर्ती दण्डक-उपहार।
जे मुर्ती चित्रकूट आश्रम शोभायमान;
प्रेमदया-करूना-आगार॥

”हौ मुर्ती असली नै, तहू पर असली रं,
दुखिया के जीवन के सार।
जेना कोय सपना सच्चाई रं ढारै छै,
जिनगी में सुन्दर बिचार“॥

-कही केॅ सीतां झटाक सें फेरै छै,
रूसी केॅ तमकी केॅ मूँ।
रामोॅ के ध्यानोॅ में आँधी रं बही छै,
झटकारी-झटकारी लू॥

”गाछी सें छूटी के गिरलोॅ कोय लत्ती रं,
बैठली छै सीता उदास।
खुली केॅ विथरलोॅ केश छै अनरूक्खें;
उफसी केॅ चलै छै साँस“॥

”बियाबान जंगल छै, सँगी-सहारा नै,
एकाकी दुर्बल शरीर।
ज्ञान-शून्य, क्रिया शून्य, सूनोॅ बिचारोॅ सें;
पिपनी पर अटकलोॅ नीर“॥

”फतकैछै-महाराज! फेरूसेॅ अगुवैल्हेॅ,
हमरोॅ जनानी के रूप
पत्नी के पातिब्रत ताखा पर राखीकेॅ;
अग्निदेव साखी सब झूठ“॥

आकुल रं, व्याकुल रं, बेसुध बताहा रं,
आनचोके होय उठलै राम।
गाछी के छाया-तर, पोखरी के पाटोॅ पर;
भरमाबेॅ लागलै बेजान॥

दूरोॅ सें देखी कं लछुमन ने रामोॅकेॅ,
सहमलोॅ बनिका के बीच।
मूड़ी झुकैने, कुछ सोचने-बिचारने रं;
मन्द-मन्द ऐलै नगीच।

पैरोॅ पर पड़ी केॅ साष्टांग इंगित सें,
आगमन देलकै जनाय,
बोललकै बिनती के सूरोॅ में कर जोड़ी-
मूर्खोॅ के सूनोॅ हो भाय-

”ज्ञानी केॅ शोभेॅ नै, शास्त्रें बताबै छै,
बितला पर करबोॅ बिचार।
राजा ने जोगै छै मर्जादा राजोॅ के;
सही केॅ दूख असंभार॥

लौकिक अपवादोॅ के डरोॅ सें करी कं,
वैदेही मैया के त्याग।
डुबलोॅ छोॅ सोचोॅ में, फेरू सें नेतै छोॅ;
वहेॅ टा लौकिक अपवाद॥

कहतै छै राजा जनानी के सोचोॅ में,
रात-दिन डुबलोॅ निभोर।
राबन के घरोॅ में रहला सें तेजने छै;
जेकरा की जंगल में घोर।

तोरेटा धीरज सें टिकलोॅ छै धरती,
आ टिकलोॅ छै सौंसे आकास।
मर्यादा तोरे टा सभैं बखानै छै
तोरे उजासें उजास॥

बैदेही मैया के हिरदय में भरलोॅ छै,
तोरा में भक्ती अगाध।
अस आपनोॅ तीनों टा लोकोॅ में फैलाबोॅ
हुनकोॅ छै एक्केटा साध॥

मन होलै रामोॅ के हौलकोॅ रं सूनी केॅ,
लछुमन के नीतीमय बात।
मुस्की केॅ आँखी सें बरसैलकै किरन-बान;
काटी केॅ आँधियारी रात॥