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सत्ता की टेक्नोलॉजी / भारतेन्दु प्रताप सिंह

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क्या टेक्नोलॉजी है, तकनीक मत कहो।
कि चोर दरवाजा आसाम से खुलता है,
और दिल्ली पहुँचा देता है,
कि पिछला दरवाजा इटली, वाशिंगटन
और लंदन से खुलता है,
फिर भी दिल्ली पहुँचा देता है।
तभी तो मुमकिन है, विदेशों से भी,
डाइरेक्ट इन्वेस्टमेंट-सस्ती खरीददारी मत कहो।
दिल्ली के सीधे दरवाजे का नाम तो,
लाल किला है या शायद है सुनामी, अहमदाबाद
अयोध्या, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि-आदि,
तभी तो लाल किले का तिरंगा फड़फड़ा रहा है।
दिल्ली मंच का राजदरबार,
लगा है बार-बार, पर इस बार
टेक्नोलॉजी है बड़ी असरदार,
लाएगी इस मंचन में प्रोफेशनल किरदार,
चुनिंदा, भरोसेमंद, टिकाऊँ,
सस्ते स्वांगिए को राजा बनाया है।
बाकायदा प्रशिक्षित है–विदेशी रंगमंच से।
बहुत ही विद्वान है-विदेशी भाषा बोलता है।
बहुत ही सज्जन है-प्रतिवाद नहीं करता।
बहुत ही सरल है-हमारी अनगिनत कठिनाईयों से बेखबर है, अपरिचित है।
साफ-सुथरा है-मिट्टी से बहुत दूर अंतराष्ट्रीय मंच का चरित्र है।
खुलकर हँसता नहीं-पब्लिक के हँसने का इंतजार करता है।
खुलकर रोता नहीं-पब्लिक के रोने का इंतजार करता है।
क्योंकि यह स्वाँग–रोजी रोटी का नहीं, उसकी साख का, उसकी इमेज का
सवाल है।
क्योंकि मंच का राजा, जमीन पर पाँव नहीं रखता,
जबसे दिल्ली की ही जमीन पर लुढ़क गया॥
देखो-देखो, नजारा देखो,
देश यानी सिल्वर स्क्रीन कितनी साफ-सुथरी है,
देखो देश की तस्वीर का सीधा प्रसारण रंगमंच से,
दिल्ली के रंगमंच से।
पर पब्लिक नहीं देखती, नहीं देख सकती,
उसे काम की तलाश है।
सुनो-सुनो-सुनो।
क्या सुने, क्या देखें-सफेद पर्दा जिसमें कोई रंग नहीं।
तालियाँ नहीं बजी, नारे नहीं लगे,
बजता रहा सत्ता का आर्केस्टा।
चुनिंदा राजा के चुनिंदा दरबारी,
फुसफुसाने लगे कान में
सर, नाटक नहीं चल पा रहा है, साल बीत गया,
सचमुच कर देते हैं सनसनीखेज एक्शन,
तहलका मचा देते हैं पब्लिक में।
इसके लिए करना होगा पब्लिक का ट्रायल,
हत्याएँ या हिरोशिमा वाला बम फोड़ दें।
या काटकर लटका देते हैं एकाघ,
जत्थेदार-सूबेदार इसी पब्लिक के.

भूल जाते हैं सुनामी, अहमदाबाद और मुनाफे में विदेश जाती धन-सम्पदा,
राजा चुप रहा-इमेज का सवाल था-दरबारी एक्शन में आ गए.
एक बम फोड़ने लगा, एक ट्रायल करने लगा और
एक सफेद पर्दे पर हावर्ड, न्यूयार्क, पेरिस और रोम के चित्र दिखाने लगा।
यह दिल्ली है, बम्बई है, यू.पी है, बिहार है, गंगा है, कृष्णा-कावेरी है।
अरे यह तो गोयबल्स था, रंगमंच से बोल रहा है, 21वीं सदी का गोयबल्स,
और वह तो हिटलर ही है-अब रंगमंच से अपना काम चला रहा है।
पर सचमुच की हत्याएँ, अबकि बार चुनिंदा हत्याएँ, रणनीतिक हत्याएँ,
कितना फर्क आ गया है-द्वितीय विश्वयुद्ध और तृतीय विश्वयुद्ध की
तबाही में–तानाशाही में–टेक्नोलॉजी का कमाल है।
हमारे पास न तो चोर दरवाजे है, न पिछले दरवाजे,
न तो हम रंगमंच तक पहुँच सकते हैं और न ही हमारी आवाज।
सुनसान मैदान, खाली रहा बेजान,
तब अंत में इसी टेंस माहौल में-
ठहाके में आयी नेपथ्य में खुलते चोर दरवाजे से आवाज-
यही ठीक है मेरे वफादार।
सचमुच चलेगी अब भारत सरकार,
इसी रंगमंच से॥ हा-हा-हा॥
क्योंकि यह सत्ता की टेक्नॉलाजी का सवाल है।