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सद्गुरु गौरव - १ / नाथूराम शर्मा 'शंकर'

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जिसमें सत्य सबोध रहेगा,
कौन उसे सद्गुरु न कहेगा।
जो विचार विचरेगा मन में, अर्थ बसेगा वही वचन में,
भेद न होगा कर्म-कथन में, तीनों में रस एक बहेगा।
सद्गुण-गण-गौरव तोलेगा, पोल कपट-छल की खोलेगा,
जय प्रमाण-प्रण की बोलेगा, मार मार-भट की न सहेगा।
मोह-महासु से न डरेगा, कुटिलों में ऋजु भाव भरेगा,
उन्नति के उपदेश करेगा, गैल अधोगति की न गहेगा।
धर्म सुधार अधर्म तजेगा, योग-सिद्ध शुभ साज सजेगा,
‘शंकर’ को धर ध्यान भजेगा, दुःख-हुताशन में न दहेगा।