भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सपना-2 / मन्त्रेश्वर झा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तहिया। देखैत रही। सपना।
जे हम उड़ि रहल छी। गगन मे।
क्षितिज के पार तक जाइत।
सम्पूर्ण अस्तित्व केँ। अपने
विशद के व्याख्या बुझैत।
ओह, कतेक स्वर्णिम छल।
ओ सपना।
सुती आ सपनाक ओहि
लोक मे। लीन भऽ जाइ।
विलीन भऽ जाइ।
अपन कल्पना लोक मे।
आ नीन टुटय तऽ। सपनो
टुटि जाय।
आ हम धरती पर खसि
पड़ी ढनमनाय।
सपना आइयो देखैत छी
मुदा! बाप रे बाप!
देखैत छी। सपना मे
केवल। अपने टा पाप।
अपना मोनक आतंक।
भय। स्वार्थ।
देखैत छी केवल। घृणित
अर्थशास्त्र।
नीन टुटैये तऽ जागि जाइछ।
अपन ओढ़ल रूप।
महानताक ढोंग।
नम्रताक आलंब।
मुदा सेहो छल। काल्हि
आ कि परसू।
आ कि। परसूक परसू।
सपना तऽ आबो देखैत छी।
देखैत छी जगलो मे
मुदा। केवल छीना झपट।
लपेटबाक रपट।
उठापटक।
गुरुजी। खसलाह चितंग
लेखकक हुड़दंग।
अभिनेताक पलंग।
नेता क्रूर दबंग।
जनता बदरंग।
सपना मे। देखैत छी जैह।
जगलो पर सैह।
आब की सुतब की जागब।
कोना हसोथब।
कोना परतारब।
कोना जीतब। हारल बाजी।
ओह। की हम।
नहि देखि पायब।
फेर। अपन ओ सपना।
की। संपूर्ण क्षितिज।
बन्धक लागि गेलए।
बिला गेलए। संपूर्ण आकाश।
हमरा चारूकात सँ।