भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सबके एक्के कहानी रहलोॅ छै / अमरेन्द्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सबके एक्के कहानी रहलोॅ छै
जकरोॅ धरती पेॅ पानी रहलोॅ छै
केना रधिया रोॅ रौल वैं करती
जे कि बच्चै सें रानी रहलोॅ छै
ओकरा दुनियाँ में कोय डरैतै की
जे कि काठी-कमानी रहलोॅ छै
इक समन्दर छै-कोय मछली केॅ
आरो कोय ह्वेल छानी रहलोॅ छै
रात में हेना हवा के ई सरसर
लागै शैव्या ही कानी रहलोॅ छै
प्यार हमरौ रहै - सबूतोॅ में
लोरे एकठो निशानी रहलोॅ छै
लोग चुप छै मतुर ई जानै छै
केकरोॅ की-की कहानी रहलोॅ छै
जे कि रावण बनी विरोधी छै
ओकरे दिश भी भवानी रहलोॅ छै
हमरोॅ चर्चा छै ठोरोॅ-ठोरोॅ पर
के नै हमराकेॅ जानी रहलोॅ छै

-1.6.91