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सब अन्हार हो गइल / कुमार वीरेन्द्र

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आसमान में टिटिहरी बोल रही थी

धरती पर पछुआ
झोर रही थी, बाबा ने मेंड़ पर बैठ, मुँह में
गुड़ डाल, अभी लोटे का पानी उठाया ही था, दूर से एक आवाज़ आई, हाथ से
छूट गया लोटा, पानी ढरकते देखते रहे बाबा, मैं क्या पूछता, लगा, केहू मू गया
धक्क से रह गए हैं, दोबारा लाने को कहा, बोल नहीं पाए, बस,
घर जाने को इशारा किया, लोटा उठा, नदी-किनार
पकड़े चल दिया, उन कुत्तों पर
ढेला मारते, जो

एक लाश पर अपने-अपने हक़ को झगड़ रहे थे

देखा घाट पर एक पेड़ नीचे
बैठे हैं कई, कुछ बतिया रहे, कुछ कहाँ तो देखते का तो
सोच रहे, किसी की आँखों में लोर, माँझी काका से कहा, 'हमरे बाबा भी पानी नाहीं पिए...' उन्होंने
वही बताया, जो सुना था, बाबा से किसी को कहते, लौटते देखा, बगीचे में कई लोग इकट्ठे हैं, कुछ
चीख़-चिल्ला रहे, 'मार दसन सभन के, काट दसन सभन के...', ऐसे में एक कोयल
को का तो सूझ रहा था कि का, कू-कू किए जा रही थी, जिसे कुछ
चरवाहे पेड़ पर लाठी-ढेला चला, का जाने कहँवा
उड़ा देना चाह रहे थे, लौट रहा था
सूख रहा था मुँह

तब अपने यहाँ जादा इनार ही हुआ करते थे

पर कहँवा पानी पीता
केहू इनार पर नाहीं दिख रहा था, मरद दुआर पर, बुढ़ियाँ
दुआरी पर बैठी, देख-ताक रही थीं जिधर शोर, तब तक देखा, एगो साँड़ हँकरता भागा चला आ रहा
साँड़ से तेज़ भाग नहीं सकता था, एक चबूतरा पीछे लुका गया, वह भागते गाँव बाहर चला गया, पर
उसे कोई भगा रहा था कि खुदे भाग रहा था, पता नाहीं, बूझ तो ई भी नाहीं रहा था
ई आखिर मू कवन गया, जे सब-के-सब बियोग में, गाँव में कबहुँ केहू
मरे अइसा तो नाहीं होता, फिर देखा, कुछ लोग जो
रात में, दारू पीके माई-बहिन करते
दिन ही में कर रहे

पछुआ खोंस, लउर ले, गरजते दौड़े जा रहे

मैं भी देखा-देखी अपने
सँगतियों सँग दौड़े जा रहा था, और हमहीं नाहीं, कई बूढ़े-जवान
दौड़ रहे थे पाछे-पाछे, एक चिक जिसने एक खस्सी ख़रीदा था, जल्दी ही निकल जाना चाह रहा था
गाँव से, और ख़रीदे बिना, देखा, आरा से कुछ लोग, जो मुअल उसी का नाम ले, 'अमर रहें, अमर रहें'
का नारा लगाते, चले आ रहे पैदल ही, उनमें कइयों के पास थान-के-थान कपड़े तो
कुछ के पास नई साइकिलें हैं, वे चिल्ला-चिल्ला बता रहे, 'ले लिया
ले लिया बदला स्सालों से, ले लिया...', मैं समझ नहीं
पा रहा था, किससे बदला ले लिया
क्यों, शहर से किनके

कपड़े-साइकिल लूटकर ला रहे हैं लोग

देखा जिस गाँव में केहू-केहू
घर साइकिल, अब कइयों के पास, मेरे कई सँगतिया ख़ूब
ख़ुश, उन्हें देख समझ नहीं पा रहा था, ख़ुश होऊँ कि का करूँ, कबहुँ उन्हें देखता, कबहुँ हाथ में लोटा
लगा, लोटा घर रख देना चाहिए, और चल दिया, देखा, दुआर पर आजी आपन सखी सँग बैठी है, दुनो
बतिया रहीं, 'अरे जे मारा उसे मारो, सबको काहे मार रहे, भगा रहे...', देखा, कहते
सुनते रुआँसा हो रहीं, मैं आजी को ऐसे नाहीं देख सकता था
लोटा रख, आँखें पोंछते पँजरी से सट बैठ गया
बेचैन हो इतना तो कह ही बैठा
'अब रहने दो

रोओगी तो केहू ज़िन्दा थोड़े न हो जाएगा...'

और कह भी क्या सकता
था, ज़ादा समझ होती, कहता भी, तुम तो कबहुँ
भोट देने जाती नाहीं, केहू कहे हरदम इहे कहती हो, भोट देने जाऊँ तो हमर ई कमवा के
करी, तोहरा लोगन के इनरा गाँधी...फिर अब जब मू गईं, तो रो काहे रही हो...', मैं आजी
की पँजरी लगे बैठे, बस इहे देखता रहा, दोनों सखियों की रह-रह लोरा जा
रहीं आँखें, और अपनी सखी से आजी बार-बार, इहे कह
रही, इहे, 'अब त अन्हार हो गइल, सब
अन्हार हो गइल, बहिनी
का जाने

अब ई देसवा के चलाई...!'