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सभय के बिआहल हो बाबा, मगहा मुँगेर / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

बेटी को अपने पिता से शिकायत है कि उसने उसका विवाह गंगा के पार कर दिया है, जबकि अन्यान्य बेटियों का विवाह मगह या मुँगेर में किया है। उसे चिंता है कि सावन-भादो की उमड़ी हुई नदी वह कैसे पार करेगी। वह यह सोचकर अपने को आश्वस्त करती है कि बेड़ा बनाकर गंगा पार कर जाऊँगी, लेकिन उसे आशंका है कि कहीं बेड़ा डूब गया, तो गंगा में डूबकर मैं कर न जाऊँ। मरने पर माँ तो कहेगी कि मेरी बेटी ससुराल में है, लेकिन मैं तो गंगा माता का चढ़ावा बन जाऊँगी।
इस गीत में अपने पिता के घर के प्रति बेटी की अत्यधिक ममता और आसक्ति प्रकट हुई है।

सभय[1] के बिआहल हो बाबा, मगहा मुँगेर।
हमरा बिआहला[2] गँगा पारे[3] जी॥1॥
साबन भदेउआ के उमड़ल नदिया।
कओन[4] बिधि उतरब पारे जी॥2॥
सिकिया में चीरि चीरि बेड़बा[5] बनैबै[6]
ओहि रे बेड़बा उतरब गँगा पारे जी॥3॥
टूटी जैतै बेड़बा, छिलकी[7] जैतै बन्हना।
डूबी रे मरबै बीचे धारे जी॥4॥
मैया जे कहतइ धिआ ससुररिया।
हम होयबै गँगा के चढ़ौबनमें[8] जी॥5॥

शब्दार्थ
  1. सबका
  2. विवाह किया
  3. गंगा के उस पार
  4. किस प्रकार
  5. बेड़ा
  6. बनाऊँगी
  7. छिटक जायगा
  8. चढ़ौना; चढ़ावा