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समन्दर : तुम्हारा तिलिस्म बड़ा है / मुन्नी गुप्ता

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समन्दर सुनो !
       तुम्हारा तिलिस्म बड़ा है
       विशाल है, असीम है, निस्सीम है,
इसी तिलिस्म में तुम्हें रहने की आदत है ।
 
अपने तिलिस्म के बाहर
बाहरी दुनिया के तिलिस्म में
कैसे जी पाओगे ?
कैसे उन्मुक्त रह पाओगे ?
 
अपनी विशाल दुनिया से बाहर छोटी-सी चिड़िया बन
उन्मुक्त आकाश में कैसे उड़ पाओगे
 
क्या यह मुमकिन है
चिड़िया न सही, आसमाँ तले
समन्दर की तरह बह पाना ।