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समय निर्दयी है और उदासी बेहद निजी / शैलजा पाठक

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इंतज़ार को नही पता तारीखें बदल रही तेजी से.....….
जब डोंगियों में भरी जा रही होगी रेत
पेड़ों को नंगा कर रहे होंगे लोग
जगह जगह से सूखी नदियों को बाँधा जा रहा होगा
जब आसमान औंधे मुंह गिरा होगा एक गढढे मे
तितलियों के पंखो से रंग उड़ गये होंगे
चिड़िया चोंच खोले अदृश्य दाना पानी का आवाहन कर रही होगी
आखिरी सांस की बात पर किसी का दिल ना पसीजेगा
ऐसे समय में प्रेम करने वाली स्त्री के हाथ से छिन ली जाएँगी गुलाबी चिठ्ठियां
उसकी आँख में धडकते इन्तजार का स्वर मर जायेगा
बुझे आईने में दम तोडती औरत बस एक सवाल छोड़ जाएगी
सारी विपरीत स्थितियों में उसने एक बार अपने हिस्से का प्यार ही तो माँगा था
बहुत बड़े पहाड़ के नीचे सांस लेती एक प्रेम कहानी
जिसे कभी किसी ने नही लिखा ना सुना ना कहा
सब डोंगियों में रेत भर रहे हैं...