भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सम्बन्धों के हवामहल / त्रिलोचन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कल तुम्हें

जिन्होंने बुलाया था

क्या वहाँ

तुमने कुछ पाया था

या केवल चाहते थे

कान वे

शब्द शब्द शब्द रहे

दान वे

जी अलग तुम्हारा

अकुलाया था ।


अनचाहे ये ऎसा

मिल जाना

सुलझाना फिर फिर

ताना-बाना

क्या तुम्हें

कभी रास आया था ।


ये सब सम्बन्धों के

हवामहल

रचते हों कितनी भी

चहल-पहल

पूछो अपने मन से

अपना कुछ लाया था ।