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सम्बोधन / स्वप्निल स्मृति / चन्द्र गुरुङ

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महोदय
सर्कसघर नहीं है देश
न ही समय
बादशाह की मूर्ति।
 
तुम्हारे हाथ में है
जो हस्तिनापुर और महाभारत की युद्ध सुन्दरी
और तुम्हारे हाथ में है
उत्तरआधुनिक ‘रिमोट कन्ट्रोल’
जिससे तुम नचा रहे हो पेशेवर वेश्या जैसी शांति।

तम्हारे हाथ में है– हिंसक राजदण्ड
और सोचते हो – यही है आखरी जादुई छड़ी
लाशों के ढेर
ढेर के ऊपर ढेर
ढेरों के दरबार में
जो है वैदिक साम्यवाद की गद्दी
हाँ उसी पे बैठे हो तुम– जंगली ऋषिमुनि जैसे।

तम्हारे हाथ में है– नरभक्षी बन्दूक
साथ में एक कुरूप कला
पर खुद शाकाहारी होने की घोषणा के
बड़े बड़े होर्डिङगबोर्ड लटका रखे हो
गली गली वधशालाओं में।

तम्हारे हाथ में है– गीता
और अज्ञात युवती के बलात्कार के बाद
तत्काल हत्या में प्रयोग रक्तरंजित चाकू।

जो तुम्हारे हाथ में है–
एक टुकड़ा साफ खादा
राजकीय अभिनन्दन में
उसी बलात्कृत युवती के पिता द्वारा समर्पित।
महोदय
हमारे हाथ में कुछ नहीं है
यहाँ तक कि इस देश की एक मुठ्ठी मिट्टी भी नहीं
पर तुम्हारे हाथ में बहुत कुछ है।

सब से ज़्यादा घृणित तो
तुम्हारे हाथ में है– राष्ट्रीय झण्डा
जो है तुम्हारे गुप्ताँग ढकने का हथियार
मानो
राष्ट्रीयता तुम्हारी वासना
और राष्ट्र है तुम्हारा गुप्तांग।

तुम्हारे अभिमान को समेटे
तुम्हारे महत्वाकांक्षाओं को लपेटे
एक पुरातात्विक टोपी
चाहे वह हमारे पैरों तले हो
चाहे वह तुम्हारे सिर पर ही हो
जिसका कुछ अर्थ नहीं है हमारे लिए
हाँ वह भी तुम्हारे ही हाथ में है।

महोदय
हीरे मोती, धनसम्पत्ति, फौज
मान लो भगवान ब्रह्मा का अण्डकोष भी
सभी तुम्हारे हाथ में हैं।
पर तुम्हारा दुर्भाग्य
तुम्हारे हाथ में नही हैं जनता और समय
तुम्हारी आयु भी हमारे हाथ में है।

हाँ खाली हैं हमारे हाथ।

जानिए महोदय
सबसे ज्यादा डरावनी
सबसे ज्यादा सृजनशील
सबसे ज्यादा परिवर्तनकामी
तो खाली हाथ ही होते हैं।
जब भरेंगे
कुछ चीजों से हमारे हाथ
समझ लेना
उस वक्त तुम्हारे हाथ में
क्या होगा, क्या नहीं।