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सम्भल सको तो / ओम पुरोहित ‘कागद’

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आंख उठा कर
कंधोँ से ऊपर
देखा तुम ने
अन्न से महकी
...सांसोँ की गंध पा कर
जीवन भर गर्वाए तुम
आंख झुका कर
देखो अब तो
पगथल के नीचे
कितने भूखे प्यासे
लाचार दबे हुए !
सम्भल सको तो
सम्भलो तुम
पैरोँ के नीचे से
धरा खिसकने वाली है
झुक कर देखो तो
वो दुनिया उठने वाली है।