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सहर का हुस्न गुलों का शबाब देता हूँ / ख़ुर्शीद अहमद 'जामी'

सहर का हुस्न गुलों का शबाब देता हूँ
नई ग़ज़ल को नई आब ओ ताब देता हूँ

मेरे लिए हैं अँधेरों की फाँसियाँ लेकिन
तेरी सहर के लिए आफ़ताब देता हूँ

वफ़ा की प्यार की ग़म की कहानियाँ लिख कर
सहर के हाथ में दिल की किताब देता हूँ

गुज़र रहा है जो जे़हन-ए-हयात से ‘जामी’
शब-ए-फिराक़ को वो माहताब देता हूँ