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साँझ-9 / जगदीश गुप्त

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नन्हीं-नन्हीं बँूदों से,
शीतलता बिखर रही थी।
निमर्ल जल से घुल-घुल कर,
हिरयाली निखर रही थी।।१२१।।

झुक गई दूब की पलकें,
आँसू का भार सम्हाले।
पागल समीर ने आकर,
सब मोती बिखरा डाले।।१२२।।

धीरे-धीरे ऊषा ने,
नीरज की आँखें खोली।
पंखों को मुखर बनाकर,
कुछ भर्मरावलियाँ बोलीं।।१२३।।

हिल उठे सनाद जलज-दल,
हो गया सलिल लहरीला।
गिर इन्दु-बिन्दु ने सर में,
कर ली समाप्त निज लीला।।१२४।।

अवशेष चार-छै बँूदें,
जो भी थीं पंखुरियों पर।
चुन लिया उन्हें चुपके से,
रिव की किरनों ने आकर।।१२५।।

मैं पूरित-पुलक पुलिन से,
सब कौतुक देख रहा था।
दृगजल की नश्वरता को,
शबनम में लेख रहा था।।१२६।।

बीचियाँ चपल आ आकर,
छू जाती थीं चरणों को।
मैं मसल उठा आँसू से,
भीगे कुछ धूलि कणों को।।१२७।।

जब एक-एक कर नभ से,
सब तारक खिसक रहे थे।
सूनी प्रभात-बेला में,
सुख-सपने सिसक रहे थे।।१२८।।

आहों की धूमिल रेखा,
हो गई धवल धुल-धुल के।
नयनों से आँसू बनकर,
जब पुलक हृदय के ढुलके।।१२९।।

युग-युग से रहे समाये,
इत ?ाुुलीन पुतली में।
फिर भी तुम जान न पाये,
दृग हैं कितने पानी में।।१३०।।

किसने निज गुन से बाँधी,
कल्पना-विहग की पाँखें।
खुल गई देखकर किसको,
मेरे सपनों की आँखें।।१३१।।

रजनी भर रहा निरखता,
मैं दोनों पलक पसारे।
कब कौन कहां से आया,
रच गया आेस कन सारे।।१३२।।े

तुम रमते रजत-रजनि से,
बेसुध छिव की छलकों में।
फिर इन्दु-बिन्दु बन जाते,
जाने क्यों इन पलकों में।।१३३।।

पिरमल-जल से बोझीली,
पंखुरियाँ झुकी हुई थीं।
ढुलकी-ढुलकी कुछ बँूदे,
कोरों पर रूकी हुई थीं।।१३४।।

ये भरे-भरे से आँसू,
वे रँगे-रँगे से कोये।
अरूनाई के डोरो में,
किसने जल-फूल पिरोये।।१३५।।