भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

साँप-आवास समस्या / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बिलों में रहते थे साँप।
सोचा-‘यहाँ तो रहता है घना अँधेरा,
वर्षा का पानी भी भर आता है।
चलो, पेड़ पर रहें; हाँ, चन्दन के पेड़ बड़े अनुकूल हैं।’
एक पेड़ खुला अधिक था,
पकड़े जाने का डर भी भारी था।
फिर सोचा-
‘वहाँ रहें-जहाँ कुछ-कुछ अँधेरा भी हो,
चन्दन की खुखबू भी हो-
विश्वास-भरे साँसी-सी मादक!
सर्दी से भी बचे रहें-
गरम रक्त की-सी कुछ ऊष्मा से;
हृदय की धड़कन का मृदु संगीत भी तो
कुछ सुनने को मिले!
रक्षित भी रहें, और खुले भी।
फैलाव के लिए गुंजायश भी हो।
लावारिसों की तरह, आदिवासियों की तरह-
सदियों तक, सहस्राब्दियों तक,
बचते-लुकते, रेंगते, भटकते,
कंुडली-मारते, फुँफकारते,
अब जा कर पाया है उन्होंने आवास एक-डीलक्स,
सुरक्षित और समशीतोष्ण,
सुविधाएँ जहाँ सारी-आस्तीन!