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साज़ आहिस्ता ज़रा गरदिशे जाम आहिस्ता / मख़दूम मोहिउद्दीन

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साज़ आहिस्ता ज़रा गरदिशे जाम आहिस्ता
जाने क्या आये निगाहों का पयाम आहिस्ता ।

चाँद उतरा के उतर आए सितारे दिल में
ख़्वाब में होठों पे आया तेरा नाम आहिस्ता ।

कू-ए जानाँ[1] में क़दम पड़ते हैं हल्के-हल्के
आशियाने की तरफ़ तायर-ए बाम[2] आहिस्ता ।
उनके पहलू के महकते हुए शादाँ झोंके[3]

यूँ चले जैसे शराबी का ख़राम[4] आहिस्ता ।
और भी बैठे हैं ऐ दिल ज़रा आहिस्ता धड़क
बज़्म है पहलू-ब-पहलू है कलाम[5] आहिस्ता ।

         ये तमन्ना है के उड़ती हुई मंज़िल का ग़ुबार
          सुबह के पर्दे में या आ अई शाम आहिस्ता ।

शब्दार्थ
  1. प्रेमिका की गली
  2. मुंडेर का पक्षी
  3. सुख पहुँचाने वाले हवा के झोंके
  4. चाल
  5. छंद, काव्य