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साधना-दीप / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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कितनी बार जलाया दीपक-
जला न अब तक!

युग-युग से ऊषा आती है,
कितनी ज्योति जगा जाती है;
मिली न लेकिन एक किरण भी
मेरे दीपक को आवश्यक!

कितनी आईं दीपावलियाँ,
जगे राजपथ, जागीं गलियाँ;
पड़ा रहा पर दीप अभागा-
मेले के बालक जैसा थक!

रूई थी तो तेल नहीं था,
एक साथ सब मेल नहीं था;
जब सब साधन थे, आँसू से-
भींग सलाई गई अचानक!

कभी वेग से चलीं हवाएँ,
आगे, पीछे, दाये-बायें,
लगा हृदय से, ओट हाथ दे-
हार गया आँचल से ढँक-ढँक!

यदि दो पल को कभी जला भी,
मुँह फैलाये तिमिर टला भी,
तो सम्मुख आराध्य नहीं थे-
जिनके लिए नयन थे अपलक!

नन्हा सा दीपक-है ही क्या!
दो पल जलने का न सलीका!
तिस पर फण फुंकार रहा है-
अन्धकार का मोटा तक्षक!

कितनी बार जलाया दीपक-
जला न अब तक!