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साधना है ख़ुद को / संतोष श्रीवास्तव
Kavita Kosh से
बारिश तेज थी
मंजिल गुम थी
निशान मिटते गए
ताजी धुली राह
दूर तलक बलखाती
जाने किस मोड़ पर मुड़ गई
किसी ने बताया था
ऐसी एक भी
रेखा नहीं हथेली पर
जो ज़िन्दगी को
ठिकाने पर पहुँचा दे
इंतजार भी तो मगर
किस बात का ?
कोई आहट भी तो नहीं होती
कोई ख़ुशबू ,कोई पैगाम
जो पहुँचा दे ठिकाने तक
जिसके बरअक्स उभर आएँ
कुछ ऐसे निशान
जिनके सहारे खड़ी हो सके
मीनार लक्ष्य की
तब ख़ुद को साधना होगा
सोच लेना होगा
नहीं चलना है पदचिन्हों पर
बना लेना है दुर्गम राहों पर
कुछ पगडंडियाँ कुछ पड़ाव
कि जिन पर चलकर पहुँच जाएँ
भटके हुए
मंजिल तक