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साम्प्रदायिक दंगों के दिनों में / उषा उपाध्याय

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यक्ष

मेरे शहर की
रोती आँख पोंछता पवन
इस वर्षा-ऋतु में अब
किस यक्ष का संदेश लेकर जाते हुए
मेघ का
सहचर बनेगा ?

हिंस्त्र-पशु

दिन में
किसी हिंस्त्र-पशु की तरह
आँखों में ख़ून भरे
चीते की तरह लपकता हुआ,
ज़ूनून से जबडा फाड़कर
कराल पंजा उठाता
मेरा यह शहर
रात को
शांत हो जाता है
हिचकी खाते-खाते
माँ की गोद में सो गए
बच्चे की तरह

'बौद्ध-भिक्षु


मेरे शहर के
भड़-भड़ जलते मकानों की
अंगार-राशि को भला
कल्पना-दरिद्र उस प्राकृत कवि ने
हाल में कहाँ देखा होगा ?

अन्यथा वह
फागुन में खिलकर
झर-झर झरकर
धरती पर बिछते
पलाश के फूलों को
बुद्ध के चरणों में
समर्पण करते भिक्षुओं की उपमा
कभी नहीं देता....


मूल गुजराती से अनुवाद : स्वयं कवयित्री द्वारा