भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सार्थकता / दिनेश कुमार शुक्ल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं नहीं कहता कि कविता
कालविजयी हो हमारी
जब मरेगा आदमी तो
मरेगी कविता हमारी

आदमी के साथ
उसके मोर्चों पर
वह लड़ेगी,
गाज बन कर
शोषकों की फौज पर
वह जा गिरेगी
घ्वंसरंजित छन्दहीना,
-जिसे छीना जा सकेगा नही
टैंक और बमों से,
आदमी के 'वियतनामी स्वत्व' की
वह नई परिभाषा करेगी ।

वरेगी पाइपगनों को,
खाईयों का, झाड़ियों का,
भूख से बेसुध घरों का,
अस्पतालों, चीरघर का,
मौत में सोते शहर का,
औ' गरजती लहरियों का
बादलों, बारूद का,
वह, बन्द होती सांस तक का
सही मूल्यांकन करेगी ।

आज का, पिछले बरस का,
और भी पिछले बरस का
पर्त ऊपर पर्त जमकर
सूख कर काला पड़ा
यह खून लड़ते आदमी का
हर तरफ बिखरा पड़ा है
सूखती ये खून की पर्तें
कि जिसके जगमगाते पृष्ठ हैं
-वह विजयगाथा
आदमीयत की संजोयगी ।




आदमी के साथ ही वह हँसेगी
आदमी के साथ रोयेगी

विखर जायेगी ये कविता धूल में
किन्तु फिर
नये युग की कल्पना के
बीज बोयेगी