भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

साहवरेआँ घर जाणा / बुल्ले शाह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सदा मैं साहवरेआँ घर जाणाँ, नी मिल लओ सहेलड़ीओ।
तुसाँ वी होसी अल्ला भाणा, नी मिल लओ सहेलड़ीओ।
रंग बरंगी सूल उपट्ठे,
चंझड़ जावण मैनूँ।
दुक्ख अगले मैंनाल लै जावाँ,
पिछले सौपाँ किहनूँ।
इक विछोड़ा सइआँ दा,
ज्यों डारों कूंज विछुन्नी।
मापेआँ ने मैनूँ एह कुझ दित्ता,
इक्क चोली इक्क चुन्नी।
दाज एहना दा वेखके हुण मैं,
हन्झू भर भर रून्नी।
सस्स ननाणाँ देवण ताने,
मुश्कल भारी पुन्नी।
बुल्ला सहु सत्तार[1] सुणीन्दा,
इक वेला टल जावे।
अदल[2] करे ताँ जाह ना काई,
फज़लो[3] बखरा पावे।
सदा मैं साहवरेआँ घर जाणाँ, नी मिल लओ सहेलड़ीओ।
तुसाँ वी होसी अल्ला भाणा, नी मिल लओ सहेलड़ीओ।

शब्दार्थ
  1. लज्जा रखने वाला
  2. न्याय
  3. मेहर