सिक्के के दो पहलू / रुडयार्ड किपलिंग / तरुण त्रिपाठी
('स्कुलब्वॉय लिरिक्स' नामक किपलिंग के पहले काव्य-संग्रह से..)
'मैं निकलूँगा संसार में, मैं नाम कमाऊँगा
मैं सत्य के लिये लड़ूँगा, प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करूँगा
मैं जीत लाऊँगा सच्चा प्यार, और जब मैं मरूँगा
दुनिया मेरी योग्य रूप में प्रशंसा करेगी'
वह संसार में गया― प्रतिष्ठा के लिए उसने संघर्ष किया
उन लोगों ने उसे अपमान की काँटेदार माला में लपेट दिया
मैं उससे एक बार और मिला, बिल्कुल अचानक
उसके चेहरे पर दुख के निशान थे
"क्या तुम सत्य के लिए लड़ लिए? क्या तुमने निरर्थक प्रयास किया?
क्या तुमने पा लिया बिना दाग का सच्चा पवित्र प्यार?
क्या अब भी तुम्हारा नाम बड़ा हो गया है? क्या यह होगा कभी?
क्या तुम्हारी सारे लोग करने लगे हैं उचित प्रशंसा?"
उसने ज़वाब नहीं दिया― उसने बोला नहीं.
बल्कि लाल पड़े गालों में थोड़ी देर ठहरा रहा
फिर काँपते हुए, हिचकिचाते हुए, और देखते हुए ज़मीन में―
हे भगवान! वह मुझसे माँगने लगा पैसे कोई आधे क्राउन..