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सितमज़रीफ भी दिल कितना सादा रखता था / कांतिमोहन 'सोज़'

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सितमज़रीफ[1] भी दिल कितना सादा रखता था ।
बजाए-तीर वो तरकश में बादा रखता था ।।

वो क़ाफ़िला था मेरा इन्तज़ार क्यूँ करता
वगरना कूच का मैं भी इरादा रखता था ।

सितम के बाद मुरव्वत पे वो उतर आया
मैं उससे कुछ तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखता था ।

ये एक क़सूर तो अपना ज़रूर था यारो
ज़मीन तंग थी मैं दिल कुशादा रखता था ।

विकट थे उनके मुखौटे कि मैं निकल भागा
अगरचे मैं भी बग़ल में लबादा रखता था ।

ये अपना तर्ज़े-अमल आख़िरत[2] में काम आया
कोई हिसार[3] हो मैं फ़िक्रे-जादा रखता था ।

चला जो सोज़ तो मातम हुआ न जश्न मना
ये शख़्स किसलिए एहबाबो-आदा[4] रखता था ।।


शब्दार्थ
  1. सितम करनेवाला
  2. अंत में
  3. घेरा
  4. दोस्त और दुश्मन