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सिन्धु-वेला / रवीन्द्र भ्रमर

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सिंधु-वेला ।
तप्त रेती पर पड़ा चुपचाप मोती सोचता है, आह !
मेरा सीप, मेरा दूधिया घर,
क्या हुआ, किसने उजाड़ा मुझे
ज्वार आए, गए, जल-तल शाँत-निश्चल,
मैं यहाँ निरुपाय ऐसे ही तपूँगा ।

ओ लहर ! फिर लौट आ मुझको बहा ले चल ।
बहुत संभव, फिर न मुझको मिले
मेरा सीप, मेरा दूधिया घर ।
किंतु, माता-भूमि ।
आह ! स्वर्गिक भूमि ।।
सिंधु, उसकी अनथही गहराइयाँ
शंख, घोंघे, मछलियाँ, साथी-संघाती,
आह ! माता भूमि !

ओ लहर! फिर लौट आ मुझको बहा ले चल ।
तप्त रेती पर पड़ा चुपचाप मोती सोचता है ।

सिंधु-वेला ।