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सिन्धु बताओ / छाया त्रिपाठी ओझा

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कल -कल बहती सरिता की जब
मीठी इतनी जल धारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

झरनें बरखा और सभी ने
मिलकर तुम्हें सजाया है !
न्यौछावर कर नेह असीमित
प्रीति गीत ही गाया है !
किया इन्होंने खुद को अर्पण
सब कुछ तुम पर है वारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

लहरों से ले धाराओं तक
पल-पल स्नेह जताती हैं !
वर्षा की बूंदें भी आकर
मुस्काती मिल जाती हैं !
फिर भी घोर गर्जना करते
थर्राते तुम जग सारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

हीरे मोती नवरत्नों से
भरे हुए हो मान लिया !
तुम विशाल हो तुम महान हो
जलधि नाम है जान लिया !
किन्तु पथिक घनघोर प्यास से
तट पर ही जीवन सारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।