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सीमाब पुश्त-ए-गर्मी-ए-आईना दे, हैं हम / ग़ालिब

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सीमाब[1] पुश्त-गर्मी-ए-आईना[2] दे, हैं हम
हैरां किये हुए हैं दिल-ए बे-क़रार के

आग़ोश-ए-गुल[3] कुशूदा[4] बरा-ए-विदाअ़[5] है
ऐ अ़नदलीब[6]! चल कि चले दिन बहार के

यूं बाद-ए-ज़ब्त-ए-अश्क[7] फिरूं गिरद यार के
पानी पिये किसू[8] पे कोई जैसे वार के

बाद अज़[9] विदाअ़-ए-यार ब ख़ूं दर तपीदा हैं
नक़श-ए-क़दम हैं हम कफ़-ए-पा-ए-निगार[10] के

हम मश्क़-ए-फ़िक्र-ए-वसल-ओ-ग़म-ए-हिज़्र से असद
लायक़ नहीं रहे हैं ग़म-ए रोज़गार के

शब्दार्थ
  1. पारा(मरक्यूरी)
  2. आईने के चेहरे को गरमी
  3. गुलाब का आलिंगन
  4. खोलना, खुली हुई
  5. विदाई के लिए
  6. बुलबुल
  7. आँसूओं को काबू करके
  8. किसी
  9. आज
  10. निगार के तलवे का निशान